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जहां फूल नहीं सिगरेट चढ़ाने से पूरी होती है मन्नत

धार्मिक आस्था और रीति-रिवाजों से सराबोर इस देश में पूजा अथवा इबादत के लिए आमतौर पर फूलों का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की ऐतिहासिक मूसा बाग हवेली के निकट एक ऐसी मजार है जहां मन्नत पूरी करने के लिए सिगरेट चढ़ाने का अनोखा रिवाज है।

वर्ष 1857 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक हादसे में मारे गए अंग्रेज सेना के अधिकारी कैप्टन एफ वाले की मजार पर सिगरेट चढ़ाने के लिए हर जुमेरात को श्रद्धालुओं का तांता लगता है। सदियों पुरानी इस रीति के पीछे मान्यता है कि सिगरेट चढ़ाने से लोगों की मनोकामनाएं पूरी होती है।

कैप्टन की मजार के निकट सैय्यद इमाम अली शाह की दरगाह है। इस मजार की सही आयु का अंदाजा हालांकि किसी को नहीं है लेकिन किवदंतियों के अनुसार अवध के नबाब आसफउद्दौला ने वर्ष 1775 में फैजाबाद से लखनऊ आकर एकांत क्षणों को रूमानी बनाने के लिए जब मूसाबाग का निर्माण कराया था, तब उसने रास्ते में पड़ रही इस मजार के लिए कुछ स्थान छोड़ दिया था।

मूसाबाग पर इस दयालु शासक का प्रभुत्व कुछ समय के लिए रहा। नवाब के सौतेले भाई सआदत अली खान ने एक जंग के बाद इस बाग पर कब्जा कर लिया और बाग के कोने पर एक हवेली की आधारशिला रखी। अंग्रेजी हुकूमत के लखनऊ में पैर जमाने के दौरान अंग्रेज सेना के जनरल क्लाड मार्टिन ने हवेली को पाश्चात्य सभ्यता का स्वरूप देना चाहा और इस कड़ी में वहां तोड़फोड़ का काम शुरू हो गया।

अंग्रेज सेना के कैप्टन एफ वाले की अगुवाई में वर्ष 1858 को हवेली के जीर्णोद्धार के दौरान रास्ते में पड़ने वाली सैय्यद बाबा की मजार को तोड़ने से जब मजदूरों ने मना कर दिया तो इस अंग्रेज अधिकारी ने स्वयं ही कुदाल उठा कर इसे तोड़ना चाहा। कैप्टन के कुदाल उठाते ही पास के पेड़ पर बर्र के छत्ते से हजारों बर्र उसके शरीर से लिपट गई और देखते ही देखते इस अंग्रेज अधिकारी ने दम तोड़ दिया।

मान्यता है कि अंतिम समय में उसने मजार को अपवित्र करने के लिए बाबा की रूह से क्षमा याचना की थी जिससे बाबा ने उसे अपना शिष्य बनाते हुए अपने भक्तों को सपने में कहा कि कैप्टन की मजार पर हाजिरी दिए बगैर उनकी मजार पर सिर झुकाने वालों की मन्नत पूरी नहीं होगी। चूंकि कैप्टन सिगरेट और शराब का बेहद शौकीन था इसलिए उसकी मजार पर सिगरेट चढ़ाने का रिवाज आज भी कायम है।

कई पीढ़ियों से हजरत सैय्यद इमाम अली शाह की दरगाह की देखभाल में लगे फरीदी परिवार के मुखिया 70 वर्षीय मोहम्मद सलीम फरीदी ने कहा कि अपने बुजुर्गो से मिली जानकारी के अनुसार सदियों से यह मान्यता है कि सऊदी अरब से अमन का पैगाम पूरी दुनिया में फैलाने की नीयत से 14वीं सदी में यहां आए बाबा के लश्कर में कई सदस्य थे, जिसमें उनके छोटे भाई कायम अली शाह और हजरत नूर अली शाह समेत 11 सदस्य थे।

अमन का पैगाम प्रसारित करने के दौरान बाबा और उनके साथियों को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। अपना मकसद पूरा होने के बाद बाबा ने यहीं समाधि ली थी। फरीदी ने कहा कि कायम अली शाह की दरगाह गोमती नदी के तट पर मोतीमहल पूल के नीचे है जबकि हसरत नूर अली शाह की दरगाह चौक क्षेत्र में स्थित है।

अवध की गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल पेश करती मजार की रजिस्टर्ड क मेटी के 11 सदस्यों में एक नरेश कुमार ने बताया कि मजार पर चादर चढ़ाने के लिए हर जुमेरात को श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन विधायक लालजी टंडन ने मजार के रास्ते को पक्का कराने का वादा किया था जो उनके सांसद बनने के बाद भी अधूरा है।

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