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इन फिल्मों के रीमेक बनाइये..

इन फिल्मों के रीमेक बनाइये..

बेशक बॉलीवुड में फिल्मों के रीमेक का ट्रैंडनया नहीं है, लेकिन पिछले कुछ वर्षो में जिस तरह यह ट्रैंड जोर पकड़ रहा है, उससे ऐसा लगने लगा है कि बॉलीवुड के पास विषय लगभग समाप्त हो गये हैं। और चूंकि बॉलीवुड में सफलता को ही सलाम किया जाता है, इसलिए वे रीमेक के लिए ऐसी ही फिल्में चुनते हैं, जो अपने जमाने की हिट फिल्में रही हों। उन्हें लगता है कि फिल्म के साथ जुड़ा सफलता का टैग इस दौर में भी उनके लिए नयी सफलता लेकर आएगा। लेकिन ऐसा होता नहीं-हो नहीं रहा। रामगोपाल वर्मा ने ‘आग’ नाम से ‘शोले’ की रीमेक बनाया, लेकिन फिल्म न केवल औंधे मुंह गिरी, बल्कि रामगोपाल वर्मा को कड़ी आलोचना का भी शिकार होना पड़ा, यहां तक कि उन्होंने फिल्मों के रीमेक बनाने से ही तौबा कर ली। ‘डॉन’(अमिताभ बच्चन वाली) का रीमेक इसी नाम से बना और डॉन की भूमिका शाहरुख खान ने निभाई, लेकिन यह फिल्म भी फ्लॉपरही। रेखा द्वाराअभिनीत उमराव जान का रीमेक बना और इसमें उमराव जान की भूमिका ऐश्वर्या राय ने निभाई, लेकिन फिल्म फ्लॉप रही। दिलचस्प बात है कि जिन फिल्मों के रीमेक बन रहे हैं, वे  सब अपने दौर की सुपर हिट फिल्में हैं, लेकिन इनके जो रीमेक बने हैं, वे कमोबेश सभी फ्लॉप रहे हैं। कारण एकदम साफ है। शोले अपने आप में एक संपूर्ण फिल्म थी और आप शोले का ऑरिजनल शोले से अच्छा रीमेक नहीं बना सकते। और जब रीमेक बनता है तो उसकी तुलना ऑरिजनल फिल्म से होना लाजिमी है। ऐसे में रीमेक ऑरिजनल फिल्म के सामने कहीं नहीं टिकता, क्योंकि दर्शकों के जेहन में ऑरिजनल फिल्म रहती है। उसके आधार पर वह रीमेक में दसियों कमियां निकालता है और फिल्म फ्लॉप हो जाती है। रीमेक फिल्मों में संजय लीला भंसाली की देवदास जरूर हिट कही जा सकती है। उसका कारण भी यह रहा कि फिल्म में कहानी को मूल रखते हुए केवल वातावरण और कॉस्ट्यूम ही बदले गये। यानी फिल्म की कहानी वही रही, केवल कहानी के पात्रों को हाई-फाई माहौल में पहुंचा दिया गया। कहानी वही रहने के कारण इमोशंस भी वही रहे और फिल्म हिट हो गयी। लेकिन ऐसा हर रीमेक के साथ नहीं हो सकता। एक और बात यह कि पुराने दौर में तमाम ऐसी फिल्में भी हैं, जो अपने दौर की महत्त्वपूर्ण फिल्में थीं, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर वे फ्लॉप साबित हुईं। कमाल अमरोही की रजिया सुल्तान, राज कपूर की मेरा नाम जोकर, श्याम बेनेगल की शतरंज के खिलाड़ी, बोनी कपूर की रूप की रानी चोरों का राजा, गुलजार की लेकिन, मनोज कुमार की पेंटर बाबू, एम. एफ हुसैन की गजगामिनी, राजश्री प्रोड्क्शंस की हम साथ-साथ हैं जैसी ना जानें कितनी फिल्में हैं, जिन्हें उस समय बहुत महत्त्वाकांक्षी फिल्में माना गया था। तकनीकी रूप से भी इन फिल्मों में बहुत ज्यादा मेहनत की गयी थी, लेकिन इसके बावजूद ये फिल्में कोई बड़ा कमाल नहीं दिखा पाईं। मीरा, लम्हे, सेंसर, मासूम, मृत्युदाता भी इसी तरह की फिल्में हैं। लेकिन फिल्म निर्माता-निर्देशकों को यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि रीमेक के लिए हिट फिल्मों का चयन दर्शकों की उम्मीदें बढ़ा देगा और उन उम्मीदों पर खरा उतरना आसान नहीं होगा, इसलिए बेहतर यही होगा कि ऐसी फिल्मों के रीमेक बनाए जाएं, जो अपने दौर की महत्त्वाकांक्षी फिल्में थीं, जिनका विषय अच्छा था, लेकिन इसके बावजूद वे फिल्में फ्लॉप हो गईं।

आजकल बॉलीवुड में हिट फिल्मों के रीमेक बनाने का ट्रैंड जोर पकड़ रहा है, लेकिन अधिकांश रीमेक फ्लॉप साबित हो रहे हैं। बॉलीवुड के निर्माता-निर्देशकों के लिए क्या ये बेहतर नहीं होगा कि उन फिल्मों का रीमेक बनाएं, जो अपने दौर की महत्त्वाकांक्षी फिल्में थीं, जिनके विषय बहुत अच्छे थे, लेकिन इसके बावजूद वे फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हो पाईं।

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