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29 मार्च, 2020|8:15|IST

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दो टूक

इससे कौन इनकार करेगा कि दिल्ली के आटो वाले अपने व्यवहार के लिए बदनाम हैं। मीटर से न चलने या सवारी बिठाने से इनकार करने जैसी शिकायतें इतनी आम हैं कि पब्लिक से तो किसी हमदर्दी की उम्मीद उनकी हड़ताल को शायद ही रही होगी। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। कुछ कसूर सिस्टम का भी है।

यह सिस्टम एक लाख के आटो की कीमत पांच लाख तक पहुंचा देता है! यही सिस्टम ऐसे फाइनेंसरों-ठेकेदारों को पैदा करता है जो सैंकड़ो आटो कब्जे में रखते हैं और दैनिक भाड़े वाले ड्राइवरों को ट्रैफिक पुलिस और इंस्पेक्टरों की कदम-कदम की वसूली भुगतने के लिए छोड़ देते हैं! राजधानी में कोई पचपन हजार लोग आटो चलाते हैं। वे सब के सब शरारती नहीं। उनमें से बहुत से ईमानदार और सज्जन भी हैं। उनकी तकलीफों को भी देखा जाना चाहिए।