अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

मानसिक उन्माद

यायालय के कठोर आदेश के बावजूद रैगिंग का उत्पात रुक नहीं रहा। इसके चलते शिक्षा के मौलिक अधिकार से ही नहीं, अपने प्राणों से वंचित हो जाते हैं कुछ बच्चे। परीक्षा में ऊंचे से ऊंचे अंक पाने की मुहिम में बच्चों के साथ पूरा परिवार लग जाता है। क्या-क्या नहीं दांव पर लगा दिया जाता। फिर प्रवेश परीक्षाएं। प्रतिष्ठित कॉलेज और कोर्स पा जाने पर भी यह संघर्ष समाप्त नहीं होता। नए वातावरण में, नए लोग, मुश्किल पाठय़क्रम और उस पर रैगिंग का आतंक। यह चिंताएं निराधार नहीं होतीं। रोंगटे खड़े कर देने वाली दुर्घटनाएं साक्षी हैं। स्कूल की सुरक्षित चार दीवारी से निकलकर, अनियंत्रित छात्रावासों में रहने गए सहमे विद्यार्थियों के तन-मन के चीथड़े कर दिए जाते हैं।आश्चर्य की बात यह है कि इन उच्च शिक्षा संस्थानों में मेधावी छात्र होते हैं। नए शिक्षार्थियों से परिचय और मनोरांन के नाम पर परपीड़ा में वहशी खुशी पाने वाले परवर्ट हैं। इन लोगों का दम्भ मासूम किशोर-किशोरियों को अपने सामने झुकाने में तृप्त होता है। मनोविज्ञान कहता है कि जिन्होंने स्वयं हिंसा झेली होती है, मौका पाते ही वे हिंसक बन जाते हैं। मानवता की मांग यह है कि जिस दु:ख से हम गुजर चुके हों, दूसरों को उससे मुक्त रखने की कोशिश करं। इसके विपरीत आचरण मानसिक उन्माद का लक्षण है। आचार्य हाारी प्रसाद द्विवेदी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के रक्टर बने तो इस ‘भविष्यघाती यौवनोन्माद’ को नई दिशा देने के लिए आतुर हो उठे थे। उन्होंने लिखा था ‘यह एक मानसिक उन्माद है। असंयत चरित्र का भयंकर रोग है। ये लोग भूल ही गए हैं कि वे यहां पढ़ने के लिए आए हैं। अनुचित मनोविनोद के लिए नवागंतुक दुर्बल विद्यार्थियों को सताते हैं।’ आज रैगिंग सरकार और संस्थाओं के लिए चुनौती बन गया है। इसके हल के लिए अध्यापकों, वार्डनों और छात्रों के एकाुट प्रयास जरूरी हैं। वरिष्ठ छात्रों की काउंसिलिंग, कड़ी सुरक्षा व्यवस्था और कठोर दंड विधान से ही समाधान हो सकता है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: मानसिक उन्माद