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चुनावी संगीत का शास्त्र

मेरा पक्का विचार है कि नाच-गाना ही खांटी संस्कृति है। चुनावी दिनों में यह शास्त्रीय हो जाती है। इन दिनों देशभक्ित में मरे जा रहे उम्मीदवार अपनी नाक हाथ में लेकर चलते हैं, ताकि कोई काट न ले। राजनीति के कुसंस्कारों के कारण ही चुनावी मौसम में शूर्पनखा संस्कृति का प्रदर्शन पक्ष उघड़ता है। रवीन्द्रनाथ त्यागी होते तो वो मतदाता को लोक-फोक कलाकार और चुनावी उम्मीदवारों को शुद्ध शास्त्रीय घरानों के वारिस कहते। अब हरिशंकर परसाई जी को क्या कहें। एक दफा उन्होंने मेर कान उमेठते हुए बयान दिया कि- ‘अबे पहाड़ी! कायदे से पैर पटकने को कथक और गोविन्दा की तरह कमर मटकाने को लोकसंस्कृति कहते हैं।’ उनकी टुन्न अवस्था के अनुसार वाजिदअली शाह ने पांवों में ढाई छटांक के घुंघरू क्या बांध लिए, सो वो तो कथक हो गया। बाकी सब भड़ैती? वाह, वाह, राजा नाचे तो क्लासिकल। प्रजा नाचे तो नौटंकी? वे बोले- ‘अबे पहाड़ी! तेर शोध का विषय मेर क्रोध का विषय है।’ मैं खिन्न मन से लौट आया। मेरा विषय था- चुनावी संगीत में शास्त्रीयता का लोकपुट। सो मैंने सिद्ध किया कि रामराज्य में चूंकि चुनाव नहीं होते थे तब पहली ठुमरी तुलसीदास जी ने लिखी थी कि ‘ठुमक चलत रामचंद्र, बाजत पैंजनिया’। बाद में इसे बेगम अख्तर तक ने नहीं गाया, क्योंकि तब चुनाव होने लगे थे और चुनावी हल्ले के संगीत घराने में घूस भावना की प्रधानता हो गई थी। अत: रिश्वत की लय प्रचलित होनी ही थी। आज भी चुनावों में बोल बनाव की ठुमरी, भोजपुरी कैसेटबाजी में विबद्ध है। वस्त्रहीन। चुनावी संगीत के शोर-शराबे को राग की अवतारणा समझिए। कुछ नए राग इस प्रकार हैं- राग आडवाणी-ताल राजनाथ जी-द्रुत लय में। राग पंजा- पंजाबी टप्पा सहित-तात मुलायम चक्करदार। राग-लाल लाल- ताल-विलम्बित में वामपंथी। राग- आड़ा चौटाला-ताल-अजित सिंह- राग-माया। ताल-छाया लड़ीदार। राग-लालच की पखावज। ताल-मिलावटी, बदनीयती। आदि-आदि। मुझे पता है चुनावी मौसम में कड़ी धूप के आरोह-अवरोह के बाद मतदाता गर्मी में पसीने-पसीने होकर कारी गाएंगे तो चुनाव आयोग को सावन का मजा आएगा। यूं भी होली के आसपास की गई चुनावी घोषणाएं राजनैतिक नंगई की अवधि बढ़ा कर उन्हें ‘एक्सटेंशन’ देती हैं। नंगेपन का जो मधुर और मादक अलाप चुनावी दिनों में सुनाई देता है, उसकी शास्त्रीय समीक्षा केवल भूखे मेंढक और पितृपक्ष के कौवे ही कर सकते हैं। ध्यान रहे अखबारी अनुशासन के कारण यहां मेंढकों और कौओं के नाम परिवर्तित कर दिए गए हैं। चुनाव संहिता जसी खुर्राट महिला से कौन पंगा ले। अब की चुनाव में लोकगायिकी खुंदक में चुनाव मैदान में है। लोकगायकों, लॉफ्टर चैंपियनों और लौंडा नाच के नर्तकों ने यदि लोकसभा में जाने की ठानी है, तो इसमें किसी के बाप का क्या जाता है।

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