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आओ फिर उचाड़े हुए जंगल बसाएं

इस देश की पर्वत श्रंखलाओं में हिमालय सबसे नवीन भाग है और महत्वपूर्ण भी। देश की अन्य पुरानी श्रंखलाएं मौसम और पानी ने काटकर स्थिर दशा में छोड़ दी, जबकि हिमालय दस लाख वर्षो से स्थिरता पाने की ओर है। हिमखंड युग आया और गया जिसके बाद इस उप-महाद्वीप को हिमालय से एक स्थिर मौसम मिला व इससे बहने वाली नदियों ने विनाश भी दिया और उपजाऊ लवण भी। एक अद्वितीय वातावरण जिसमें सब कुछ अच्छा ही था। अरावली, विंध्याचल, सतपुड़ा, राजमहल पर्वत श्रंखलाएं मियो-प्लायोसिन युग की उथल-पुथल से इस देश के उत्तरी क्षेत्र व दक्षिण के पठार क्षेत्र की नदियों से मिल गईं, जिससे दो क्षेत्रों का जलजीवन में मिश्रण आया। उत्तरी पेलिआकेटिव क्षेत्र से भी हिमायल को लाभदायक वनस्पतियों का योगदान मिला, जो हिमालय के टेम्परट वातावरण के अनुकूल और उसे बनाए रखने में मददगार साबित हुए। इसमें देवदार, कोष (ऐलनस), बन (क्वारकस), खजूर (चेस्ट-नट), मार्न (उलमस), ओक, लॉरिक्स तथा कांटेदार झाड़ियां प्रिन्सेपिया व बरबेरिस (कशम्बल) का उल्लेख खास है। इसने हिमायल की ऊंचाइयों से तल तक अद्भुत संतुलन बनाए रखा। हिमाचल के टेम्परट व सब-टेम्परट भाग सबसे उपयोगी और जलवायु के रूप में महत्वपूर्ण रहे और इस भाग में ही सदा से मानव विकास का भार रहा है। ग्लेशियर क्षेत्र से नीचे घास के ढलान, फिर छोटी मजबूत झाड़ियां और तब अल्पाईन वृक्ष क्षेत्र व फिर चौड़ी पत्ती की, जो क्रमवार जमीन की सतह फिर उससे नीचे की गहराई व बड़ी चट्टानों को बांधकर रखने में मदद करती है। यह इस प्रकार जमीन पर पूर वातावरण के लिए प्राकृतिक जाल था। जो वर्षा के पानी का लगभग 40 प्रतिशत अपने में सोखता, समाता और बाकी को धीर-धीर नीचे की ओर ढलान में बहाकर नदियों में पहुंचाता है। मीसोजोईक युग में जमी हुई चूने की परत ने इस क्षेत्र को अधिक महत्वपूर्ण कर दिया। इस वनस्पति और जमीन से उसके साथ उभर लवणों ने अगले युग में गंगा-ामुना, ब्रह्मपुत्र, सिंधु के मैदान को आज तक उपजाऊ बनाया। इस वनस्पति ने ही सदियों तक उभरते हिमायल की भूगर्भ उथल-पुथल को चिरकाल तक बारंबार संभाला भी, वातावरण संतुलित रखा व मानव जाति की आवश्यकताओं की पूर्ति की। अगले युग में यह मानव जाति का कर्तव्य था कि उसको संकलित रखे। देश की सभ्यता ने इसे समझा और यहां एक आस्था बनाए रखी। हमार अधिकांश तीर्थ इन पर्वतों में ही स्थित हैं। मध्यकाल तक शासकों ने इसकी सुन्दरता कायम रखी। पिछली सदी के प्रारंभ तक 76 प्रतिशत जंगल था और इस क्षेत्र का अधिकतम तापमान गर्मियों में 31-33 डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं जाता था। समय के साथ विकास और बदलते युग की आकांक्षाएं उभरने लगीं। अंग्रेजों ने उन्नीसवीं सदी के मध्य में तारपीन के तेल के लिए चीड़ की किस्म लगाई। इस वृक्ष की उत्पादन क्षमता बहुत थी, लेकिन यह जमीन और वातावरण को सुखा देता है और कुछ समय बाद जमीन को अम्ल (क्षार) गुण में बदल देता है। इसके बाद रल की पटरी बनाने का भार देवदार के जंगलों पर पड़ा, जो काटकर पहाड़ के ढलानों पर लुढ़काए गए। यह पर्वत के तल को दोहरी मार थी। पूर्वी क्षेत्र में चाय के बागानों के लिए जमीन साफ की जाने लगी लेकिन इसका विपरीत असर नहीं पड़ा, क्योंकि चाय की जड़ ने जमीन की पकड़ मजबूत रखी और बागानों में छाया के लिए स्थानीय पेड़ों की किस्म लगाई, खासतौर से कोष जाति के। अंग्रेजों ने हिमालय व अन्य पर्वतों पर अपने गर्मी के मौसम में निवास और बस्ती बनाना शुरू किया। शिमला, मनाली, मसूरी, दार्जिलिंग, ऊंटी आदि इसके उदाहरण हैं। यह आधुनिकीकरण का पहला चरण था, जिसने यातायात के साधन भी खोले और बढ़ाए, पर बीसवीं सदी के दूसर भाग ने सारा दृश्य ही बदल दिया। आबादी बढ़ी, साथ में विकास की परिभाषाएं व आकांक्षाएं बदलीं व उनमें उछाल आया जसे बांध, पनबिजली योजनाएं, पर्यटन, व्यवसाय, खेती और बागवानी तथा उनकी भिन्नताएं व आधुनिक वैज्ञानिक खेती हर कार्यक्रम अपनाएं जिसमें कीटनाशक दवाएं व कृत्रिम खाद, यातायात के नए साधन जिनके लिए मार्ग निर्माण और उस पर बढ़ती आबादी की आवश्यकताएं शामिल हैं। कागज के लिए सफेदा पेड़, ईंधन लकड़ी के लिए पोपलर, अच्छे चार की योव में रोबिनियां लगाए गए आदि। यह सब बाद में विनाशकारी व हानिकारक साबित हुए। बढ़ती आबादी के लिए बन (क्वारकस) के जंगल खत्मकाटे जाने लगे जिसने पहाड़ के ढलान उखाड़ दिए। सेब की पेटियों और ईंधन आवश्यकता हेतु कोष के जंगल खत्म कर दिए जो अधिकांश में नदी किनार संरक्षण और उर्वरकता बढ़ाते थे। इसने जमीन का उपजाऊपन गिरा दिया। सफेदे ने चीड़ के साथ मिलकर जमीन सुखाई तथा पोपलर और रोबिनियां ने सेब के बागान में बोरर कीट को फैलाया, जिससे अथाह हानि हुई। देवदार व अखरोट के पेड़ निर्माण कार्य के बोझ तले खाली हो गए। दवाइयों के लिए बहुमूल्य झाड़ियों की जड़ें भविष्य के लिए बिना नई पैदावार सुनिश्चित किए उखाड़ दी गईं। आज कशाम्बल (प्रिन्सेपिया व बरबेरिस) मिलना दुर्लभ हो गया है। सीमेंट निर्माण की बस्तियों द्वारा गरमाई हवा ने सफेदा और चीड़ द्वारा बिगाड़े स्थानीय मौसम को और खराब किया। विश्व का तापमान 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। अगली आधी सदी में ऐसे हालातों में 4 डिग्री सेल्सियस बढ़ने की संभावना है। हिमालय के टेमरट क्षेत्र में गर्म मौसम से अब तापमान 38-43 डिग्री सेल्सियस पहुंच जाता है (ाो पहले 31-33 डिग्री सेल्सियस रहता था)। बादल फटने की घटनाएं तो अत्यधिक बदलते ताप भेद से बढ़ गई हैं। ग्लेशियर भयप्रद रफ्तार से पिघल रहे हैं। शिगरी ग्लेशियर मैंने स्वयं पिछले चालीस वर्षो में आधा किलोमीटर से अधिक पिघलते देखा है। यही हाल पिंडारी व अन्य हिमखंडों का है। अब समय है कि हम आधुनिकीकरण, व्यवसाय, विकास योजनाओं के साथ-साथ जो खोया है, उसकी भरपाई भी करं। आज जीव विज्ञान इतनी तरक्की कर चुका है कि हमने जो खोया है, सब वापस पा सकते हैं, योजनाओं के लक्ष्य में कटौती किए बगैर। चीड़, सफेदा और अन्य हानिकारक पौधों से क्रमबद्ध छुटकारा पाना होगा और एक नियोजित क्रम में देवदार, कोष, ओक व अन्य स्थानीय मित्र पौध के जंगल वापस स्थापित करने होंगे। इसके लिए कथनी और करनी के भेद को दूर करना सबसे जरूरी है। पर्यावरण सुधार बैठक, सप्ताह और गोष्ठी होती है, प्रशासनिक निर्णय होते हैं, योजनाएं बनती हैं और बनती हैं रूपरखाएं, लेकिन कभी जमीन पर नहीं उतारी जातीं। वक्त अब इन्हें जमीन पर उतारने का है। लेखक पर्यावरण विशेषज्ञ हैं।ं

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