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चीन की तमन्ना और हमारी सतर्कता

इधर हम कौमी तराना गुनगुनाते मस्त हैं, ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी़.’ उधर कुछ ऐसी ताकतें हैं, जो इस साजिश में जुटी हैं कि हमारे जिस्म के टुकड़े-टुकड़े कर हमारी हस्ती को पस्ती में कैसे और कितनी जल्दी बदला जा सकता है। इस बारे में खासी बहस हो चुकी है कि चीन के एक सामरिक विशेषज्ञ ने अपनी शोध के आधार पर प्रकाशित एक लेख में यह सुझाव दिया है कि यदि चीन, एशिया और विश्व में अपना प्रभुत्व बरकरार रखना चाहता है तो उसे आने वाले वर्षो में भारतीय संघ को उसके छब्बीस टुकड़ों में बांटने का प्रयास आरंभ कर देना चाहिए।

छब्बीस की संख्या अपने आप में महत्वपूर्ण नहीं और शायद इसीलिए रेखांकित की गई है कि हमारे संघीय गणराज्य में प्रदेशों की संख्या इतनी ही है। यह बात गांठ बांधने की है कि इन छब्बीस टुकड़ों को भाषा, संस्कृति और जातीय आधार पर स्वतंत्र राष्ट्रराज्य के रूप में देखा और दिखलाया जा रहा है।

लीपापोती में माहिर कई सामरिक विशेषज्ञ यह फतवा दे चुके हैं कि चीनी शोध पत्रिका में प्रकाशित यह लेख चीन की सरकार की सोच नहीं, सिर्फ एक व्यक्ित की निजी राय है। नादान से नादान इंसान भी यह जानता है कि सरकारी शोध संस्थान में उंचे पद पर पदस्थापित वेतन भोगी चीनी विद्वान की व्यक्तिगत राय इस तरह प्रकाशित नहीं कर सकता। उस पृष्ठभूमि को भी ध्यान में रखना परमावश्यक है, जिसमें यह लेख प्रकाशित हुआ। भारत और चीन के बीच संवेदनशील राजनयिक वार्ताओं का दौर शुरू होने ही वाला था और हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अपने चीनी समकक्ष से संवाद करने जा रहे थे। यहां भी ‘समकक्ष’ शब्द का प्रयोग उचित नहीं, क्योंकि अमेरिकी हो या चीनी हमारे विदेश मंत्री या सुरक्षा सलाहकार के साथ वार्तालाप के लिए जिस किसी भी अधिकारी को वह पठाते हैं, उसे ही बराबरी वाला मानना हमारी मजबूरी है।

अरूणाचल प्रदेश में महत्वाकांक्षी जल उर्जा प्रबंधन की भारतीय परियोजनाएं चीनियों को हमेशा खटकती रही हैं। उन्हीं के दबाव में भारत एशियाई विकास बैंक से इसके निर्माण के लिए अपनी अर्जी वापस लेने को विवश हुआ है। बाद में भारत ने बड़ी दबंगई से यह ऐलान किया था कि इसे पूरा करने के लिए चालीस करोड़ डॉलर की पूंजी वह खुद जुटा लेगा। जबकि चीनी भारत को यह संकेत दे रहे थे कि धनराशि ही सब कुछ नहीं। इसका निवेश जिस इलाके में किया जाना है, उसका स्वामित्व आज भी चीनी सरकार की निगाह में विवादास्पद है। पूवरेत्तर में सिर्फ अरूणाचल प्रदेश ही ऐसा नहीं, जिसे भारत से अलग करने का प्रयत्न हमारे बैरी या प्रतिस्पर्धी कर सकते हैं।

नागालैंड में अर्से से बगावत खौलती-ठंडाती रही है। हाल में इस बात के संकेत भी मिले हैं कि पाकिस्तानी आईएसआई भी इसाक-मुईवा खेमे की मददगार है। यह बात भुलाई नहीं जा सकती कि इसी खेमे के साथ विराम वार्ता के कारण मणिपुर में आक्रोश और अलगाववाद बढ़ा है। मणिपुर भी काफी समय से उपद्रवग्रस्त है और म्यांमार के साथ लगी सरहद की वजह से वहां मादक द्रव्यों और नाजायज हथियारों की तस्करी विकट चुनौती पेश करती रही है। यह सोचना अकारण नहीं कि अपने सहयोगी मित्र म्यांमार की सहायता से भारत के लिए इस सरदर्द को चीन लम्बे समय तक लाइलाज रखना चाहता है। असम में बोडो हो या उल्फा, इन सब के लिए निकटवर्ती बांग्लादेश में शरण लेना और भारत के विरूद्ध आतंकवादी हिंसा को अंजाम देना सहज रहा है।

त्रिपुरा में जनजातीय स्थिति भी कम संवेदनशील या विस्फोटक नहीं। बांग्लादेश में म्यांमार की ही तरह चीन का प्रभाव निरंतर बढ़ता रहा है। हिन्दुस्तान के जो छब्बीस टुकड़े किये जा सकते हैं, उनमें सात-आठ तो इसी भू-भाग में चीन की लार चुआते रहते हैं।

यह दुर्भाग्य है कि हमारे प्यारे हिन्दुस्तान के अनेक राज्यों में बहुत थोड़ी संख्या में ऐसे पथभ्रष्ट या असंतुष्ट तत्व हैं, जो बड़े ज़ोर-शोर से आजादी और पृथकता की मांग मुखर करते रहते हैं। हकीकत यह है कि यह अभियान सरहद पार से एक प्रायोजित कार्यक्रम के रूप में संचालित होता है। कभी धर्मिक अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के नाम पर तो कभी मानवाधिकारों के उल्लंघन के लांछन लगा इन हरकतों को आत्मनिर्णय के जनतांत्रिक अधिकार के साथ जोड़ा जाता है।

कुछ वर्ष पहले यह कुचेष्ठा पंजाब में खालिस्तानी आंदोलन के दौरान की गई थी और लगभग दो दशक से जम्मू-काश्मीर राज्य इसका शिकार रहा है। अलगाववाद सिर्फ उत्तर भारत या पूर्वोत्तर तक सीमित नहीं। आपातकाल के पहले तक द्रविड़ राजनैतिक दल उस वृहत् ईलम की स्थापना का सपना देखते थे, जिसने बाद में श्रीलंका को सर्वनाश की कगार तक पहुंचा दिया। आज भले ही लिट्टे की निर्णायक पराजय के बाद उग्र विस्तारवादी तमिल राष्ट्र प्रेमियों के हौसले पस्त हैं, चीन यह सोच सकता है कि भविष्य में राख में दबे अंगारों को हवा देकर झुलसाने वाली लपटें फिर से पैदा की जा सकती हैं।

केरल वासियों की हाल के दिनों में कमाई खाड़ी राज्यों से जुड़ी रही है और इस बात को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि एक अभूतपूर्व इस्लामी कट्टरपंथी वहां नजर आने लगी है, उन शहरों और कस्बों में भी जिनका मिज़ाज उदार और समन्वयात्मक संस्कृति वाला था। हमारे धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक दल इसे अनदेखा करते हैं और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण दूरगामी आत्मघातक आशंकाओं के प्रति अंधे बने रहते हैं। जाहिर है, यहां भी चीनी विद्वान को अपने राष्ट्रहित में संभावनाएं नज़र आ रहीं थी।

चीनी विद्वान ने जब यह दूर की कौड़ी फेंकी है, उस वक्त भारत अपनी परमाणविक पनडुब्बी को सागर की लहरों पर तैराने में लगा था और उसी वक्त रूस से खरीदे जा रहे विमान वाहक पोत विक्रमादित्य की चर्चा हो रही थी। दूर तक मार करने वाले अग्नि जैसे प्रक्षेपास्त्र हों या हमारा परमाणविक कार्यक्रम, इनके संदर्भ में निशाना हमेशा चीन की ओर ही साधा जाता लगता है। पिछले दिनों सरकार को अपने थल और वायु सेना नायकों को यह हुक्म देना पड़ा था कि चीन के मामले में वह अपनी जुबान बंद रखे। उनकी चुप्पी से चीन को कुछ फर्क नहीं पड़ता। उसने जिसके मुंह से जो उगलवाना था, उगलवा डाला।

इन भविष्यवाणियों से डरने की जरूरत नहीं सिर्फ यह समझने की जरूरत है कि जब तक हम खुद अपनी पैरों पर कुल्हाड़ी मार इस जिस्म के टुकड़े करना शुरू नहीं करते, कोई हमारा बाल बांका नहीं कर सकता। फिर भी खतरनाक साजिशों के प्रति सतर्क रहना ही अकलमंदी है। दोस्त और दुश्मन में फर्क करने का विवेक गंवाए नहीं।

pushpeshpant @ gmail. com

लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं

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