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महाश्वेता देवी : चौरासीवें में 1084वें की मां

साठ हाार डालर राशिवाले मैन बुकर इंटरनेशनल (लाइफ टाइम एचिवमेंट) प्राइज के लिए जिन 14 लेखकों का नाम चल रहा है, उनमें भारतीय लेखिका महाश्वेता देवी भी हैं। उनका कहना है कि कोई बड़ा से बड़ा पुरस्कार भी उन्हें स्पर्श नहीं करता। हां पुरस्कार में बड़ी राशि मिलती है तो वह जरूरतमंद आदिवासी अंचल के विकास में जरूर काम आएगी। मैगसेसे व ज्ञानपीठ समेत देश-विदेश के करीब बत्तीस पुरस्कारों व किताबों की रायल्टी से अब तक उन्हें 65 लाख रुपए मिले, जिसमें 62 लाख उन्होंने आदिवासी अंचलों के विभिन्न जन-कल्याणकारी कार्यो में लगा दिए। अकेले मैगसेसे पुरस्कार की राशि उन्होंने पुरुलिया के खेड़िया शबर आदिवासी समिति को दे दी तो सार्क अवार्ड की राशि नंदीग्राम के पीड़ित अंचल में लगा दी। गुजरात के दंगा पीड़ितों की मदद के लिए नकद व राहत सामग्री लेकर महाश्वेता 2002 में सात बार गुजरात गईं थीं। पैसों के मामले में गुरु नानक देव का तेरा-तेरा संदर्भ उनका आदर्श है। इसीलिए जो भी राशि उनके घर आती है, उसका अधिकतर हिस्सा आदिवासी अंचलों में या पीड़ित अंचलों में चला जाता है। संचय के नाम पर उनके बैंक एकाउंट में कुछ हाार रुपए हैं। वे आज भी कोलकाता में भाड़े के घर में रहती हैं। ‘1084वें की मां 84वें’ वर्ष में चल रही हैं और लंबे समय से डायबिटीÊा व रक्तचाप की मरीा हैं, पर इस अवस्था में भी महाश्वेता देवी जनांदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं और पुरुलिया व मेदिनीपुर के आदिवासी गांवों में पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध कराने, स्कूल, सड़क, अस्पताल बनाने के लिए भागदौड़ करती हैं। जिस हाथ से उन्होंने डेढ़ सौ उपन्यास, साढ़े तीन सौ कहानियां और डेढ़ हाार निबंध लिखे, उसी हाथ से मंत्रियों-अधिकारियों को पत्र लिखती हैं-अमुक जगह स्कूल व अस्पताल नहीं हैं, अमुक सरकारी योजना के तहत उसका इंतजाम किया जाए या अमुक के साथ यह ज्यादती हुई है, उसका तुरंत निदान किया जाए। महाश्वेता की एक बड़ी चिंता उन जंगल पुत्रों के लिए रही है जो सदियों से असहिष्णु समाज के शिकार है। आजादी के 62 साल बाद भी आदिवासी अंचलों में विकास का कार्य क्यों नहीं हो सका? आज भी आदिवासी क्यों भूमिहीन हैं? अरण्य पर से अरण्यजीवियों के स्वाभाविक अधिकार किसने छीने? आदिवासी उच्च शिक्षा से क्यों वंचित हैं? इतने प्रचार के बावजूद इंदिरा आवास योजना, जवाहर रोगार योजना, शिशु, स्वास्थ्य व विकास केन्द्र व साक्षरता केन्द्र का कोई लाभ आदिवासियों के द्वार क्यों नहीं पहुंचता? आदिवासी विकास के लिए प्रिमिटिव सब ट्राइब के नाम पर जो पैसा आता है, वह कहां जाता है? पंचायतें आदिवासियों में शराब की लत क्यों लगवा रही हैं? देश में दो करोड़ से ज्यादा घुमंतू व गैर अधिसूचित आदिवासियों को व्यवहार में आज भी जन्मजात अपराधी क्यों माना जाता है? जिन शबर आदिवासियों के हस्तशिल्प से बनी दैनिक उपयोग व सजावट की चीजें और पूजा मंडपों की सुंदर साज-सज्जा व नक्काशी आधुनिक समाज को मुग्ध करती है, उन्हें शासन-प्रशासन व मुख्य धारा के लोग मनुष्य की मर्यादा क्यों नहीं देते? इन प्रश्नों ने महाश्वेता को इतना बेचैन किया कि वे 1में पलामू के मैकलुक्सीगंज में आदिवासियों के बीच काम करने चली गईं। वे जितना अरण्यजीवियों के करीब गईं, उतना ही उनके संघर्ष से जुड़ती गईं। पलामू में बंधुआ बनाए गए आदिवासियों को मुक्त करने के लिए बंधुआ मुक्ित समिति बनाकर, पुरुलिया में खेड़िया शबर आदिवासी कल्याण समिति बनाकर और गुजरात-महाराष्ट्र के अपराधी माने जानेवाले आदिवासियों के लिए डिनोटिफाइड एंड नोमेडिक ट्राइब राइट एक्शन ग्रुप (डीएनटी रैग) बनाकर महाश्वेता ने संघर्ष किया और आज भी किए जा रही हैं। महाश्वेता के शब्द उनके कर्म के पीछे भागते हैं। उनके जीवन का उत्तर पक्ष आदिवासियों की सेवा व उपासना में ही बीता है। इसीलिए अरण्यजीवी उन्हें अपनी मां कहते हैं। वे महाअरण्य की मां हैं। महाश्वेता समाज में गैर बराबरी और किसी भी तरह के अन्याय के खिलाफ भी पूर दमखम के साथ संघर्ष करती हैं। पिछले तीन वर्षो से वे सिंगुर में अनिच्छुक किसानों की जमीन जबर्दस्ती अधिगृहीत किए जाने, नंदीग्राम के बाशिंदों पर अत्याचार किए जाने के खिलाफ लड़ रही हैं। नंदीग्राम गोलीकांड की बरसी पर उन्होंने 14 मार्च 200ो कोलकाता में पदयात्रा की और कहा कि नंदीग्राम के पीड़ितों को न्याय मिलने तक वे संग्राम जारी रखेंगी। महाश्वेता खामोशी के साथ इस दौर में आती हैं और शोषितों के दु:खों की सलीब को किसी और कथित मसीहा के कंधों पर रखने के बजाय अपने कंधे पर रखकर अंतहीन यात्रा पर निकल पड़ती हैं।ड्ढr लेखक हिन्दुस्तान के विशेष संवाददाता हैं।ं

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