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ब्लॉग वार्ता : ऊंटों का भी रेसकोर्स होता है

घोड़ों का रेसकोर्स तो फिल्मों से लेकर खबरों तक में देखा सुना है, लेकिन ऊंटों के रेसकोर्स की बात कम ही सुनी है। पूर्णिमा वर्मन अपने ब्लॉग में अरब संसार की बातों को रचती रहती हैं। कहती हैं कि घोड़ों की तरह ऊंटों के रेसकोर्स में जकी नहीं होते। उनकी जगह पर रोबोट जकी का काम करते हैं। क्लिक कीजिए http:// purnimavarman. blogspot. com और एक ब्लॉग खुलेगा जिसका नाम है- चोंच में आकाश।

पूर्णिमा बताती हैं कि ऊंटों के रेसकोर्स में रोबोट का रिमोट मालिकों के हाथ में होता है। ऊंटों की दौड़पट्टी के समांतर कार के लिए लेन बनी होती है। जिसमें मालिक बैठ कर रिमोट के जरिये ऊंटों को हांकते रहते हैं। विजेता ऊंट को लाल रंग से रंग दिया जाता है। जिसे अपनी कार के पीछे बांधकर मालिक जब इलाके में लौटता है तो उसकी शान बढ़ जाती है। शायद इसी को रईसी कहते हैं।

हिंदी फिल्मी गानों में हम कितनी बार या हबीबी सुनते हैं। पूर्णिमा इसका मतलब बताती है प्रिय या मित्र। लेकिन इसका इस्तेमाल कई संदर्भो में होता है। दुकानदार अपने ग्राहकों को हबीबी कहता है, तो कोई किसी से जब पहली बार मिलता है तो उसे हबीबी पुकारता है। अरबी में अंग्रेजी की तरह गुड आफ्टर नून या गुड इवनिंग के लिए शब्द नहीं हैं। सारे लोग शाम के छह बजे तक गुड मॉर्निंग कहते मिल जायेंगे। गुड मॉर्निंग के लिए अरबी सबा-अल-खैर का इस्तेमाल करते हैं।

पूर्णिमा हल्के से हमें शारजाह के क्रिकेट स्टेडियम में ले जाती हैं। याद दिलाती हैं कि अब शारजाह के इस स्टेडियम का जिक्र क्यों नहीं होता। एक दौर था जब भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैचों का रोमांच इस स्टेडियम से दोनों मुल्कों के घर-घर में पहुंचा था। शेख और हसीनाओं की शोखियां। अब यह स्टेडियम अपनी गुमनामी से निकलने के लिए संघर्ष कर रहा है। बीसवीं सदी के अंत में मैच फिक्सिंग के कारण बदनाम हुआ यह स्टेडियम अपने बुरे दौर से गुजर रहा है।

एक वक्त था, जब शारजाह का यह स्टेडियम क्रिकेट मैच से थकता नहीं था। 1984 से लेकर 2003 तक बीस साल में यहां 189 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच खेले गए। जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। कहती हैं, जिसे भी शारजाह और इस स्टेडियम से प्यार है, वो दुखी है। स्टेडियम से निकलते ही पूर्णिमा अरबी समोसे की बात करने लगती हैं। जिसे शावरमा कहा जाता है। शावरमा दो चीजों से मिलकर तैयार होता है। खमीरी रोटी जिसे खबूस कहते हैं और मसाला जो खबूस में भरा जाता है। खबूस कुछ-कुछ भटूरे जैसी होती है, लेकिन इसे तलते नहीं हैं। भट्ठी में सेंकी जाती है।

ब्लॉग से पता चलता है कि पूर्णिमा और उनके दोस्त दुबई से लेकर अमीरात और शारजाह में काफी सक्रिय हैं। साहित्य से लेकर नाटक तक की दुनिया। ये लोग इंटरनेट पर अभिव्यक्ति नाम से एक पत्रिका भी निकालते हैं।

पूर्णिमा और उनके दोस्तों का एक और ब्लॉग है- शुक्रवार चौपाल। यहां नाटक से जुड़ी उनकी तैयारियां, परेशानियां और खुशियां सब दर्ज हैं। दस्तक और बड़े भाई साहब के मंचन की तैयारी का जिक्र है। लिखती हैं कि आज दस्तक की रिहर्सल के बाद निर्मल वर्मा की कहानी का वीकेंड पाठ हुआ। डॉ. उपाध्याय, मूफी, अश्विनी, सबीहा सब मौजूद थे। इस ब्लॉग पर दुबई में हिंदी नाटकों और साहित्य की दुनिया का रोमांच मिलता है।

http:// shukravarchaupal. blogspot. com पर शारजाह में होने वाले नाटकों और तैयारियों का जो जिक्र है, उससे पता चलता है कि मुल्क बदल जाने के बाद भी  निष्ठा नहीं बदलती। शुक्रवार चौपाल पर लगी तस्वीरें बताती हैं कि वहां भी दिल्ली की तरह मंडी हाउस इन लोगों ने बना दिया है।

पूर्णिमा फरवरी की एक शाम के बारे में लिख रही हैं। कहती हैं कि पांच सौ की क्षमता वाला थियेटर पूरा भरा, मौसम सुहावना बना रहा और मध्यांतर की चाय स्वादिष्ट। गुरुवार के प्रदर्शन के उपलक्ष्य में शुक्रवार की चौपाल नहीं ब्लॉगी। अनुज हिंदुस्तान जा रहे हैं। शायद लंबे समय के लिए। चौपाल के साथ वे मित्र, सहयोगी, मार्गदर्शक के रूप में जुड़े रहे। उनकी कमी सदा महसूस होगी। पता चलता है कि गैर मुल्क को ये नाटकों के जरिये किस तरह अपना बना रहे हैं।

इनके ग्रुप में हिंदुस्तान के भी लोग हैं और पाकिस्तान के भी। सुबह से लेकर शाम तक नाटकों के लिए साझ है। अरब दुनिया के भीतर का हिंदुस्तान जिसकी चर्चा शेखों की नवाबी की आंधी में दब जाती है, ब्लॉग के जरिये बाहर आ रही है। हिंदी ब्ब्लॉग की दुनिया विदेशों में रह रहे भारतीयों को एक खुशनुमा मंच दे रही है। शारजाह के ब्लाग पर शाहजहांपुर वालों की भी दाद नजर आती है। चोंच में आकाश नजर आता है।

ravish@ ndtv. com

लेखक का ब्लॉग है naisadak. blogspot. com

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