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आतंकवाद का राजनय

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मुख्यमंत्रियों की बैठक में पाकिस्तानी जमीन से फिर आतंकी हमले की तैयारी के बारे में जो आशंकाएं जताई हैं, उससे पाकिस्तान रक्षात्मक मुद्रा में आ गया है। उसने अपना दामन साफ दिखाने के लिए ऐसी तैयारियों पर कार्रवाई के लिए भारत से पूरी जानकारियां मांगी है। बल्कि उसने आतंकवाद के मसले से ध्यान बंटाने के लिए भारत की रक्षा तैयारियों और अमेरिकी विमान ड्रोन की खरीद के बारे में विदेश मंत्री एस. एम. कृष्णा के बयान को भी चर्चा में घसीटना शुरू कर दिया है।

जाहिर है, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जो आतंकी आशंकाएं जताई हैं, उनका एक मकसद भारतीय जनता और घरेलू सुरक्षा तंत्र को चौकस करना तो है ही, लेकिन उससे बड़ा मकसद पाकिस्तान से अपनी नाराजगी जताना है। इस बयान के साफ मायने हैं कि पाकिस्तान अपने वायदे के मुताबिक उन आतंकी समूहों पर कार्रवाई नहीं कर रहा है, जो मुंबई पर हमले में शामिल थे, बल्कि अन्य समूहों को आगे भी हमला करने की तैयारी का मौका दे रहा है। प्रधानमंत्री का यह बयान महीने के अंत में न्यूयॉर्क में होने वाली  संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के बीच में सचिवों की वार्ता पर भी प्रभाव डालने के लिए है।

हालांकि मिस्र के शर्म-अल-शेख में पाकिस्तान प्रधानमंत्री गिलानी के साथ दिए साझा बयान में वे आतंकवाद पर कार्रवाई को वार्ता से अलग कर चुके हैं, लेकिन इस बात को मनमोहन सिंह अच्छी तरह जानते हैं कि भारत की सुरक्षा की कीमत पर वार्ताएं नहीं चलाई ज सकतीं। विपक्ष के कड़े विरोध के बीच जब वे साझ बयान का बचाव कर रहे थे, तब भी इस बात को दोहरा रहे थे कि हम भारतीय जमीन पर हमला करने वाले पाक आतंकियों पर कार्रवाई की जरूरत को नजरंदाज नहीं कर रहे हैं। लेकिन क्या यह मामला महज राजनयिक बयानबाजी तक सीमित रहने वाला है?

क्योंकि प्रधानमंत्री ने आतंकी संगठनों की बढ़ी घुसपैठ और उनकी ज्यादा मारक क्षमताओं के बारे में जो जनकारी दी है, वह राष्ट्रीय स्तर पर चिंता पैदा करने वाली है। हमें भीतरी तौर पर ज्यादा चौकस होने की जरूरत तो है लेकिन सिर्फ उतने से काम चलने वाला नहीं। जरूरत पाकिस्तान में भी भारत विरोधी आतंकी संगठनों पर सख्त कार्रवाई करने की है और वह काम वहां की सरकार आसानी से नहीं करने वाली है। इसलिए भारत को पाकिस्तानी दांव को निष्फल करने के लिए ढुलमुल रवया छोड़ कर उस पर पर्याप्त राजनयिक दबाव बनाना ही होगा।

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