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जसवंत का जिन्ना मोह

कारण बताना मुश्किल है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी के भीतर एक जिन्ना ग्रंथि है, जो हर कुछ समय बाद पार्टी के कुछ लोगों को इतिहास की नई व्याख्या करने के लिए प्रेरित करती है। लालकृष्ण आडवाणी के बाद अब पार्टी के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह ने पाकिस्तान के निर्माता मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ में जो कसीदे काढ़े हैं, वे इतिहास की किसी उलझन को सुलझने के बाद भाजपा के वर्तमान को उलझने और नई भूमिका बनाने वाले हैं।

जो आडवाणी ने कहा था, जसवंत सिंह की बात उससे ज्यादा अलग नहीं है। आडवाणी नेहरू को हमेशा ही छद्म धर्मनिरपेक्ष कहते थे, फिर एक दिन अचानक ही उन्हें लगा कि जिन्ना धर्मनिरपेक्ष थे। जसवंत सिंह इससे चार कदम आगे बढ़ गए हैं, उनका तर्क है कि जिन्ना तो भले आदमी थे, भारत विभाजन के असल गुनहगार तो नेहरू और सरदार पटेल थे। आडवाणी के जिन्ना वाले बयान पर भाजपा के भीतर अच्छा खासा हंगामा हुआ था और लगभग पूरी पार्टी उनके खिलाफ लामबंद हो गई थी। जसवंत सिंह, आडवाणी जितने बड़े नेता नहीं है लेकिन उन्होंने ज्यादा बड़े विवाद की भूमिका लिख दी है।

हालांकि जसवंत की कही बातों से पल्ला झड़ना पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ दोनों के लिए ही आसान है, क्योंकि एक तो वे पार्टी के सव्रेसर्वा नेता नहीं हैं और दूसरे वे संघ की गणवेशधारी परंपरा के नहीं हैं। लेकिन जसवंत सिंह ने जो कहा है उसका विवाद भाजपा व संघ से उनके मतभेदों से ज्यादा बड़ा है, क्योंकि वह सीधे तौर पर उस नींव को झझकोरने की कोशिश है, जिस पर आज का भारत और उसकी परिकल्पना खड़ी है।

जिन्ना को सही मानना उस विचार को सही मानना है, जिसने भारत का सांप्रदायिक आधार पर विभाजन किया था। और यह कहना भी हमें बड़े खतरनाक नतीजों की ओर ही ले जएगा कि जिन्ना ऐसा नहीं चाहते थे, लेकिन नेहरू और पटेल की राजनीति ने उन्हें इसके लिए मजबूर किया। इसे सही मान लिया जाए तो इसका सीधा अर्थ यह निकलेगा कि महज राजनीतिक मतभेदों के चलते देश के विभाजन की कोशिश करने में कुछ भी गलत नहीं है। यह एक ऐसा विचार है जिसे कांग्रेस, भाजपा या संघ ही नहीं दुनिया का कोई भी संगठन या कोई भी देश स्वीकार नहीं कर सकता। इस विचार को तो शायद पाकिस्तान के लोग भी स्वीकार नहीं करेंगे।

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