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कौन सी राह है दीवान-ए-आम की

देश की जनता की नब्ज पहचानने के लिए जनता दरबार लगाने का सिलसिला कोई नई बात नहीं है। मुगलों के समय में भी अकबर और शाहजहां के दरबारों की चर्चा इतिहास में दर्ज है। इंदिरा गांधी जनता दरबार लगाती थीं। जगन्नाथ मिश्र का जनता दरबार बिहार में बेहद लोकप्रिय हुआ। जगन्नाथ मिश्र के पहले ललित नारायण मिश्र भी जनता दरबार का आयोजन करते थे। केदार पांडे भी दरबार लगाते थे। कमलापति त्रिपाठी का जनता दरबार लोकप्रिय रहा। मध्य प्रदेश में रवि शंकर शुक्ल और द्वारिका प्रसाद मिश्र दोनों ने जनता दरबार लगाकर जनता की समस्याओं को सुना। हमारे देश की गरीब व बेबस जनता बहुत कुछ कहना चाहती है। पर समस्या यह है कि वह अपना दुख दर्द किससे कहे। निचले पायदान पर तो उस बेबस जनता की सुनवाई के बदले उसे धकिया दिया जता है। जनता सत्ता के शीर्ष व्यक्ित प्रधानमंत्री से बहुत कुछ कहना, सुनना और दिखाना चाहती है, पर वहां तक पहुंचा कैसे जए, यही विकट समस्या है।
वी. के. सिंह, गोविन्दपुरी, नई दिल्ली

सूखे की दस्तक
अब तो यह पक्का हो गया है कि नाकाफी मानसून के चलते देश के करीब एक चौथाई जिले (161/645) सूखे की चपेट में आ जएंगे। प्रधानमंत्री ने ऐलान तो किया है कि देश में खाद्यान्न के पर्याप्त भंडार हैं और कोई भूखा नहीं रहेगा, मगर यह समय ही बताएगा कि हमारा प्रबंधकीय तंत्र सूखे की मार ङोलने वालों तक ‘राशि-राशन’ पहुंचाने में कहां तक कामयाब होगा। कीमतें बढ़ने के कारण सूखे का असर थोड़ा बहुत सभी वर्गो पर पड़ेगा, फिर भी कुछ ऐसे भाग्यशाली लोग भी हैं जो इस मरोड़ को ङोलने की क्षमता रखते हैं। उन्हें चाहिए कि अपने पीड़ित हमवतनों के साथ हमदर्दी जरूर जताएं और जसा कि लाल बहादुर शास्त्री जी ने 1965 की जंग के बाद देशवासियों से आह्वान किया था, सप्ताह में एक बार, दो वक्त नहीं तो एक वक्त का व्रत जरूर करें। उन्हें थोड़ा तो महसूस जरूर होगा कि खाली पेट सोना आसान नहीं होता।
डॉ. आर. के. मल्होत्रा, नई दिल्ली

स्वतंत्रता किसकी?
स्वतंत्रता उसकी जो
शारीरिक रूप से बलवान हो,
जिसका चरित्र महान हो,
जिसके हृदय में हो प्रेम
जो नहीं खेलता हो अपनों से गेम
भगवान स्वरूप नागर, नई दिल्ली

न चेते तो परिणाम भुगतेंगे
ग्लोबल वार्मिग के भयंकर परिणाम सामने आने लगे हैं। इस समस्या से भारत ही नहीं वरन् विश्व के लगभग सभी देश प्रभावित हैं। दुनिया के एक हिस्से में कहीं सूखा पड़ा है तो दूसरे हिस्से में भयंकर बाढ़ की स्थिति है। कहीं जंगल दावानल की भेंट चढ़ रहे हैं तो कहीं जमीन फट रही है। यह प्रकृति का रौद्र रूप नहीं तो और क्या है? परन्तु फिर भी मानव जति आंखें मूंदे अपनी गलतियों को दोहरा रही है। प्रकृति से निरंतर छेड़छाड़ के चलते आज हम ये दिन देखने को मजबूर हैं। जीवन को आसान बनाने के नए-नए तरीके ईजद करने के चलते हमने अपने भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं। मानव बनाम प्रकृति की परोक्ष जंग ने जीवन को कठिन राह पर लाकर खड़ा कर दिया है।  यदि हम समय रहते अब भी न चेते तो शायद कल हो न हो। और तब हम चाह कर भी कुछ नहीं कर सकने के लिए मजबूर होंगे।
भूपेन्द्र रतूड़ी, सुमन नगर, देहरादून

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