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राजरंग

मेर पैरों में घुंघरू बंधा दे..एनडीए के एक बड़े नेताजी इन दिनों काफी नाराज हैं। उनकी बड़ी इच्छा थी कोयलांचल से चुनाव लड़ कर पार्लियामेंट में दहाड़ने की। मगर दिल्ली और पटना में बैठे बड़े नेताओं ने चुपके-चुपके गठबंधन कर सब गुड़ गोबर कर डाला। ऐसे में नेताजी की नाराजगी स्वाभाविक है। वह इन दिनों ताल ठोक कर कहते हैं : हमें पार्टी सिर्फ सेंबुल दे दे, फिर मेरी चाल देख ले। यानी जीत सुनिश्चित जानिये। नेताजी की यह बात सुन कर एक मशहूर फि ल्मी गीत की आवाज कानों में गूंजने लगती है: मेर पैरों में घुंघरू बंधा दे, तो फिर मेरी चाल देख ले। लेकिन पार्टी के नेता गठबंधन धर्म पर अड़े हुए हैं। न उन्हें सेंबुल दे रहे हैं, न ही उनके पैरों में घुंघरू बांध रहे हैं। तिलमिलाये नेताजी चुनाव लड़ने की ललक में दूसरी पार्टी के नेताओं से भी टिकट के लिए चुनावी दोस्ती का हाथ बढ़ाने से बाज नहीं आ रहे हैं। यानी बगावत पर भी उतारू हैं। चुनावी मौसम में टिकट का खेल बहुत निराला होता है। सचमुच, चुनाव लड़ने का जोश ही कुछ अजीब होता है।

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