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पर्यावरण क्लियरेंस में व्याप्त भ्रष्टाचार पर बिफरे पीएम

पर्यावरण क्लियरेंस में व्याप्त भ्रष्टाचार पर बिफरे पीएम

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पर्यावरण से जुड़ी योजनाओं को मंजूरी दिए जाने में व्याप्त भ्रष्टाचार पर गहरा क्षोभ जताते हुए मंगलवार को कहा कि यह एक नए किस्म का लाइसेंस राज बन गया है।

प्रधानमंत्री ने नई दिल्ली में राज्यों के पर्यावरण और वन मंत्रियों के राष्ट्रीय सम्मेलन के उदघाटन भाषण में कहा कि मैं इस धारणा की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा कि पर्यावरण क्लियरेंस नए तरह का लाइसेंस राज और भ्रष्टाचार का स्रोत बन गए हैं। यह ऐसा मामला है जिस पर तुरंत ध्यान दिए जाने की जरूरत है। विकास और पर्यावरण जरूरतों में संतुलन बैठाने की आवश्यकता है, लेकिन यह प्रक्रिया साफ सुथरी, पारदर्शी और परेशानी मुक्त होनी चाहिए।

उन्होंने कहा, मुझे बताया गया है कि पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट में अक्सर असंगतियां होती हैं। उन्होंने आग्रह किया कि जिन राज्यों ने अभी तक पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकार का गठन नहीं किया है वे जल्द से जल्द ऐसा करें।

जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने की प्रौद्योगिकी को विकासशील देशों से नहीं बांटने के विकसित देशों के अड़ियल रवैये की आलोचना करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि ऐसे में हमें बढ़ती घरेलू उर्जा की मांग को देखते हुए अपनी खुद की पर्यावरणोन्मुखी क्षमताओं को मजबूत करना होगा।

उन्होंने कहा कि हमारी उर्जा आवश्यकताएं आने वाले दशकों में काफी बढ़ेंगी। हमें पर्यावरण के अनुकूल रास्ते पर आगे बढ़ना होगा।  मनमोहन ने पर्यावरण एवं वन मंत्रियों के राष्ट्रीय सम्मेलन में कहा कि इसके लिए हमें ऐसी नई प्रौद्योगिकियों तक पहुंच बनानी होगी, जो विकसित देशों के पास पहले से मौजूद थीं। हमें नयी, पर्यावरण के अनुकूल प्रौद्योगिकियों में निवेश करना होगा।

उन्होंने कहा कि हमें पर्यावरण के अनुकूल नीतियों के वैज्ञानिक आधार को मजबूत करना होगा और चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए क्षमता मजबूत करनी होगी। हमें पर्यावरण संरक्षण के आंदोलन के नेतृत्व के लिए सभी संबद्ध पक्षों विशेष तौर पर युवाओं को शामिल करना चाहिए।

विकसित देशों की इस आलोचना कि वैश्विक उष्मीकरण (ग्लोबल वार्मिंग) से निपटने के लिए भारत ज्यादा कुछ नहीं कर रहा है, पर प्रधानमंत्री ने कहा कि किसी के मन में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि हम इस बात को पूरी तरह मानते हैं कि यह मुद्दा न सिर्फ भारत के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि इसके समाधान को लेकर हमारी प्रतिबद्धता भी है।

उन्होंने कहा कि इस दिशा में उठाये जाने वाले कदम के रूप में राज्यों को अपनी कार्ययोजना बनानी चाहिए जो जलवायु परिवर्तन पर पिछले साल पेश की गयी राष्ट्रीय कार्ययोजना के अनुरूप हो।

जलवायु परिवर्तन के तटीय इलाकों पर होने वाले प्रतिकूल प्रभाव के बारे में प्रधानमंत्री ने कहा कि इस संबंध में राज्यों और द्वीपीय क्षेत्रों के अधिकारियों को एकीकत नजरिया तैयार करने के लिए केन्द्र के साथ समन्वय से काम करना चाहिए। उन्होंने नदी सफाई के मुद्दे की चर्चा करते हुए विशेष उद्देश्य कोष जैसे रचनात्मक माडल के जरिए नदी संरक्षण के प्रयासों को तेज करने की आवश्यकता जताई।

उन्होंने राज्यों से कहा कि वे राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के जरिए कानूनी प्रावधान लागू करें ताकि नदियों में औद्योगिक कचरे की मात्रा में कटौती की जा सके। मनमोहन ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण के काम में सामुदायिक भागीदारी महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि हमारे आदिवासी पर्यावरण के पैदल सिपाही हैं। उन्होंने हमारे वनों की सुरक्षा की है और प्रकति के साथ मिलजुल कर रहने का नायाब तरीका अपनाया है। आदिवासी अधिकार कानून वनों में रहने वाले लोगों के जायज अधिकारों की गारंटी करता है।

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