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ऑनलाइन जासूसी करते पेरेंट्स

ऑनलाइन जासूसी करते पेरेंट्स

पाश्चात्य देशों की तरह पिछले कुछ सालों में भारत में भी सोशल नेटवर्किग वेबसाइटों की लोकप्रियता काफी बढ़ी है, खासकर किशोरों और युवाओं में। यही कारण है कि फेसबुक, ऑरकुट, याहू आदि लोकप्रिय वेबसाइटों के अलावा तमाम अन्य पोर्टल भी हैं, जिन पर दोस्तों की कोई कमी नहीं है। यहां आप अपने पुराने किसी दोस्त को तलाश सकते हैं और देश-विदेश में नए-नए दोस्त बना भी सकते हैं।

दोस्ती, सहयोग, सांस्कृतिक-भौगोलिक आदि जानकारी की दृष्टि से तो सोशल नेटवर्किग साइटों की उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता, पर अक्सर इसका इस्तेमाल ठीक ढंग से नहीं होता। या तो अपना नाम-पता बदल कर चैटिंग या फ्रैंडशिप मैसेजिंग के माध्यम से यूं ही समय खराब किया जाता है या फिर इनके माध्यम से एडल्ट वेबसाइटों के द्वार खुल जाते हैं। इन दुष्परिणामों को देखते हुए ही अब नए जमाने के पेरेंट्स भी अपने बच्चों पर लगाम कसने का मन बना चुके हैं।

‘वैसे तो मेरा बेटा अभी सिर्फ 10 साल का है और किसी सोशल नेटवर्किग साइट से उसका कुछ लेना-देना नहीं है, पर अब उसको अपने दोस्तों से, स्कूल से ऐसी बेबसाइटों की जानकारी मिलने लगी है। ऐसे में भले ही वह ऑनलाइन गेमिंग में लगा हो, उस दौरान मैं उसके साथ जरूर बैठती हूं।’, कहती हैं गृहिणी सुप्रिया साहनी।

कंप्यूटर आज की जरूरत है और शैक्षणिक दृष्टिकोण से भी अब इसके बगैर काम चलना संभव नहीं है। ऐसे में जरूरत यह ध्यान रखने की है कि इसका सही इस्तेमाल किया जाए। ऑनलाइन फ्रेंडशिप और चैटिंग के शौकीनों के माता-पिता ने तो अपने बच्चों पर नजर रखने का एक और तरीका ढूंढ़ निकाला है। अब वे खुद भी सोशल नेटवर्किग पोर्टल के सदस्य बनने लगे हैं, ताकि अपने ही बच्चों के साथ ऑनलाइन चैटिंग कर सकें। इस तरह उनके लिए बच्चों की ऑनलाइन हरकतों को जानना-समझना आसान हो गया है। हालांकि कुछ लोग माता-पिता की ऐसी कोशिशों को सही नहीं ठहरा रहे।

‘नहीं, ऐसा करने में कोई बुराई नहीं है। इसे बच्चों की आजादी में दखल नहीं कहा जा सकता। यह जासूसी बच्चों के हित के लिए होती है, ताकि वे गलत लोगों के संपर्क में आकर गलत राह पर न चल पड़ें या किसी साइबर क्राइम का शिकार न बन जाएं।’ कहते हैं व्यवसायी रमण शर्मा, जिन्हें अक्सर अपने काम के सिलसिले में घर से बाहर रहना पड़ता है। तो ऐसे में उन सभी किशोरों, युवाओं को सावधान हो जाने की जरूरत है, जो दिन-रात सोशल नेटवर्किग वेबसाइटों से चिपके रहते हैं और जिनके सैकड़ों-हजारों अनजाने दोस्त हैं।

बच्चों की ऑनलाइन हरकतों पर नजर रखने के लिए अभिभावक खुद भी कंप्यूटर और ऑनलाइन चैटिंग या फ्रेंडशिप की सारी प्रक्रिया को जानने-समझने की कोशिश करने लगे हैं। ‘पेरेंट्स का भी वेब एजुकेटेड होना आज की जरूरत है।’ कहते हैं शिक्षक अश्विनी तोमर। तभी तो अब कंप्यूटर में उन सॉफ्टवेयरों का डाला जाना जरूरी समझ जाने लगा है, जिनसे पॉर्न वेबसाइटों को खुलने से रोका जा सके।

पेरेंट्स अब वेब हिस्ट्री, कुकीज आदि का मतलब समझने लगे हैं, जहां से बच्चों की ऑनलाइन क्रिया-कलापों के बारे में आसानी से समझ जा सकता है। बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए यह सब बेहद जरूरी है।

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