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आपदा से निपटने की तैयारियों की खुली पोल

ढही दो मंजिला इमारतों ने प्राकृतिक आपदा से निपटने को लेकर जिला प्रशासन की तैयारियों की पोल खोल दी। मलबे में दबे तीन लोगों को निकालने में प्रशासनिक अधिकारियों को आठ घंटे मशक्कत करनी पड़ी। इस एक ही हादसे ने अफसरों के पसीने छुड़ा दिए। प्रशिक्षित स्टॉफ यहां नदारद दिखाई दिया। यह हाल तो तब है जब प्राकृतिक आपदा के नाम पर हर साल सरकारी कर्मचारियों को ट्रैनिंग दी जाती है। जिस पर लाखों रुपये खर्च होते हैं। शहर में कोई बड़ा हादसा हो गया तो प्रशासन कितना मुस्तैद है? इस घटना से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।

सेक्टर-15 में सुबह 11.20 पर ढही दो मंजिला इमारत की सूचना मिलते ही प्रशासनिक अधिकारियों की सांसे फूल गई। मलबे में दबे मजदूरों को निकालने के लिए आनन फानन में दो प्राइवेट जेबीसी व एक क्रेन मंगवाई। इसमें प्रशासन ने अपने संसाधानों का इस्तेमाल नहीं किया। हालांकि हुडा व नगर निगम के पास जेबीसी हैं। ऐसी घटना से निपटने के लिए स्टॉफ अलर्ट न होने से प्राइवेट मशीनरी का इस्तेमाल किया गया।

दो मंजिला इमारत का मलबा हटाने में आठ घंटे लगे। इतना समय तो तब लगा जब दो बच्चे व महिला मलबे में दबी हुई थे। उनको  बाहर निकालना था। यहां भी आपात स्थिति से निपटने की प्रशासन की दक्षता पर प्रश्न चिन्ह लगा। इस घटना की जिम्मेदारी लेने से हुडा व नगर निगम बचते रहे। हुडा के एक्सईएन ने कहा कि सेक्टर-15 नगर निगम के सुपुर्द कर दिया है।

यहां देखभाल की जिम्मेदारी निगम प्रशासन की है। दूसरी तरफ निगम के अफसरों का कहना था कि विकसित करने के बाद सेक्टर निगम को रखरखाव के लिए दिए जाते हैं। मकान बनवाने के नियमों की जिम्मेदारी हुडा की होती है। निगम सिर्फ रखरखाव करता है। दोनों विभाग के अफसर इस मामले की जिम्मेदारी लेने से बचते रहे।

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