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प्रधानों ने जिसे चाहा ‘गरीब’ बना दिया, सात साल पुरानी सूची से बंट रही है पेंशन

गरीब की पहचान करने का काम पूरी तरह प्रधानों पर छोड़ दिया गया। वृद्धावस्था पेंशन के लिए बीपीएल की 2002 की सूची को मानक बनाया गया। पिछले सात साल में न जाने कितने नए गरीब सामने आ गए जिनके पास रहने खाने का ठिकाना नहीं। लेकिन इनके लिए पेंशन की कोई योजना नहीं। सरकारी योजनाओं का पैसा खाने के लिए ग्राम प्रधानों ने उन्हें गरीब बना दिया जिनके दुतल्ले मकान हैं और कई एकड़ जमीनें हैं। इनकी पेंशन के खाते राष्ट्रीयकृत बैंकों के बजाए सहकारी बैंकों में खुलवाए गए ताकि घपलेबाजी आसान हो जाए।

वृद्धावस्था पेंशन योजना में घपला केवल सीतापुर और सुल्तानपुर जिले में नहीं हुआ। कमोबेश प्रदेश के सभी जिलों का यही हाल है। कम उम्र के नौजवान और गरीबी रेखा के ऊपर रह रहे लोग इस योजना का फायदा उठा रहे हैं। जो वाकई गरीब हैं उन्हें कहीं कुछ नहीं मिल रहा। इनके सत्यापन की कोई फुलप्रूफ व्यवस्था सरकार के पास नहीं है।

पेंशन का सारा कारोबार ग्राम प्रधानों पर छोड़ दिया गया। ग्राम प्रधानों का चुनाव 2005 में हुआ था। बीपीएल की सूची 2002 की थी। जाहिर है यह उनके वोटर नहीं थे। चुनाव जीतने के बाद इन प्रधानों ने सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए अपने लोगों को कागजों पर गरीब बनाना शुरू कर दिया। 

2002 की बीपीएल सूची को स्कैन कर उसमें से असली गरीबों के नाम हटाकर अपने नाम शामिल कर लिए गए। बीपीएल संख्या पुरानी रही लेकिन नाम और पते बदले हुए थे। प्रधानों ने फर्जी दस्तावेजों के साथ फार्म को आगे बढ़ा दिया।

आवेदनों की जाँच का काम समाज कल्याण विभाग के बाबुओं का है। अब उनका हाल सुनिए। सीतापुर में जिला समाज कल्याण विभाग में एक हैं महेश बाबू। फर्जी पेंशन के मामले में महेश बाबू के खिलाफ पहली एफआईआर पिछले साल 28 नवम्बर को हुई थी। ग्राम प्रधान से मिलकर महेश बाबू ने पेंशन में घपला किया था। 22 अपात्रों को पेंशन देने के मामले में महेश बाबू दोबारा फंसे। उनके खिलाफ दो एफआईआर और हुईं। एक एफआईआर तो एसडीएम ने कराई।

जिला समाज कल्याण अधिकारी लिखते-लिखते थक गए, लेकिन तीन एफआईआर होने के बावजूद समाज कल्याण निदेशालय उन्हें निलंबित करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। इसका असर यह हुआ कि पूरे महकमे का मनोबल बढ़ गया। विभाग के अधिसंख्य बाबू भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। ताजा पेंशन घोटाला इसी की देन है। हालांकि समाज कल्याण के अधिकारी अब कह रहे हैं कि सबके खिलाफ कार्रवाई होगी।

नवम्बर 2007 में राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना के नाम के आगे इंदिरा गांधी जुड़ गया। इस योजना में शर्त थी कि राज्य सरकार को यह प्रमाणित करना होगा कि उनके द्वारा समस्त पात्र लाभार्थियों को योजना में शामिल कर लिया गया है। एक शर्त यह भी थी कि पेंशन लाभार्थियों के डाकघर या सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक खाते में डाली जाएगी।
 
लेकिन प्रधानों ने डाकघर या सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पेंशनरों के खाते खुलवाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। ये खाते जिला सहकारी बैंक, मिनी बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों में खुलवाए गए जहाँ आसानी से घपले किए जा सकते हैं।

केवल सीतापुर में देखें तो बैंक आफ बड़ौदा में 162, सेंट्रल बैंक में 272, यूको बैंक में 281, यूनियन बैंक में 57 और यूनाइटेड बैंक में केवल 15 वृद्धावस्था पेंशनरों के खाते हैं। स्टेट बैंक जैसे कई शाखाओं वाले बैंक में भी केवल 1486 खाते हैं। जबकि क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक में 71,350 और जिला सहकारी बैंक में 15,000 से ज्यादा पेंशनरों के खाते खुले हैं। सबसे ज्यादा घपले इन्हीं बैंक खातों में हुए हैं

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