DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

धीरे-धीरे बिहार का मौसम बदलने लगा है

बिहार में आजकल एक प्रयोग चल रहा है। इसे प्रयोग के बदले कुछ खास तरह की बुराइयों से मुक्ति यानी आजादी की जंग भी कहा जा सकता है। इस जंग में एक साथ कई लोग व संगठन जूझ रहे हैं। हालांकि यह जंग जितनी महत्वपूर्ण है, उस अनुपात में उसका शोर कम है। कहीं अदालतें अपराध और भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरी ताकत से सक्रिय हैं तो कहीं मीडिया का एक हिस्सा कई तरह की बुराइयों से मुकाबिल है। कुछ मुद्दों पर राजनीतिक दल व नेता एक दूसरे के आमने-सामने हैं तो कहीं पुरानी और नई कार्य संस्कृतियों को लेकर अफसरों केपरस्परविरोधी स्वार्थ टकरा रहे हैं।
इसी जंग के जरिए अगले कुछ ही महीनों में यह फैसला होना है कि बिहार में भ्रष्टाचार, जातिवाद और परिवारवाद जैसी बुराइयों की संरक्षक शक्तियां निर्णायक रूप से पराजित होंगी या अंतत: जीत उन बुराइयों की ही होगी? अब लड़ाई निर्णायक दौर में पहुंच रही है। जंग कई स्तरों पर लड़ी जा रही है। बिहार विधानसभा के 18 चुनाव क्षेत्रों में उपचुनाव होने वाले हैं। हाल के दशकों में यह परंपरा बनी कि जिस जनप्रतिनिधि के निधन या इस्तीफे के कारण कोई सीट खाली हुई, उसके ही किसी परिजन को चुनावी टिकट दे दिए गए।
सत्तारूढ़ जद(यू) ने इस बार साफ-साफ यह कह दिया है कि किसी परिजन को पार्टी इस उपचुनाव में उम्मीदवार नहीं बनाएगी। इसको लेकर जद(यू) में आंतरिक विद्रोह की स्थिति है। टिकटार्थी नेता इस सवाल पर जद(यू) को राजनीति में नई संस्कृति विकसित करने देंगे या नेतृत्व से विद्रोह कर देंगे, यह सवाल काफी महत्वपूर्ण हो गया है। नई राजनीतिक संस्कृति और पुराने चलन के बीच जद(यू) में ही जंग है। देखना दिलचस्प होगा कि जद(यू) अपनी लाइन पर टिकता है या परिवारवादियों के समक्ष घुटने टेक देता है। अभी तो यह एक ही दल के भीतर परिवारवाद से मुक्ति की जंग हो रही है। यह भी बिहार के लिए नई बात है। बाद में शायद अन्य दलों के भीतर भी ऐसी जंग हो।
उधर जातीय वोट बैंक बनाकर वर्षों तक चुनाव जीतते रहने वाले कुछ नेता व दल इन दिनों परेशान हैं। विभिन्न जातीय वोट बैंक को एक तरफ तोड़ने की कोशिश हो रही है तो दूसरी ओर उसे फिर से मजबूत व ठोस करने की चेष्टा हो रही है। इसमें भी यह तय होना बाकी है कि अंतत: कौन जीतता है। बिहार विधानसभा का सन् 2010 का आम चुनाव यह बता देगा कि जातीय वोट बैंक की राजनीति कारगर रहेगी या नहीं। दरअसल जो नेता अपने लिए जातीय वोट बैंक का सुरक्षित किला बना लेता है, वह सत्ता में आने के बाद आम लोगों के सामान्य विकास में कोई रुचि नहीं रखता।  
वैसे नेतागण कुछ खास जातीय समूहों व व्यक्तियों के लिए ही सरकारी स्तर से सामूहिक व व्यक्तिगत लाभ पहुंचाने की कोशिश करते रहते हैं। इससे राज्य या देश पीछे चला जाता है। इस शैली की राजनीति से बिहार को बड़ा नुकसान हुआ है। इस शैली की राजनीति करने वाले नेता गत चुनाव में हार जरूर गये हैं, पर वे फिर उसी शैली की राजनीति चला कर फिर से सत्ता पाना चाहते हैं। क्या वे सफल हो पाएंगे? इसका जवाब भी अभी आना बाकी है। इसके विकल्प में इस राज्य में एक दूसरी शैली यह चल रही है कि समाज की विभिन्न जातियों की अलग-अलग समस्याओं का अध्ययन करके उन सबके लिए उनकी जरूरतों के अनुसार थोड़ी-बहुत राहत व कल्याण के सरकारी काम करवाए जाएं। यानी समावेशी विकास कार्य चलें। तभी पूरे राज्य का भी समरूप विकास होगा।    
अब देखना है कि इन दोनों शैलियों में से किसकी जीत होती है। यानी जनता किसे अधिक पसंद करती है। हालांकि गत लोकसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि बिहार की जनता ने समावेशी विकास व सुशासन की शैली को पसंद किया है।
भ्रष्टाचार व अपराध के लिए कभी बिहार चर्चित रहा। इनके खिलाफ भी जंग जारी है। इन बुराइयों को पालने- पोसने व मजबूत करने वाले इस जंग में जीतेंगे या हारेंगे? अभी तो अपराध की शक्तियां भारी दबाव में हैं। त्वरित अदालतों के जरिए राज्य के करीब 35 हजार छोटे-बड़े अपराधियों को गत तीन साल में सजा दिलवाई जा चुकी हैं। इनमें से अनेक सजायाफ्ता कभी के राजनीतिक महाबली व माफिया तत्व रहे हैं। वे भी इन दिनों विभिन्न जेलों में एड़ियां रगड़ रहे हैं। पर राजनीति व प्रशासन में अपनी जड़ें मजबूती से जमाए बैठी भ्रष्टाचार की शक्तियां अभी बेखौफ हैं। उन्हें लगता है कि उनका कुछ नहीं बिगड़ सकता। खास तौर पर केंद्रीय सेवाओं के अधिकतर अफसर बिहार में लूट तंत्र के मजबूत स्तम्भ बने हुए हैं। उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया जटिल है।
इस प्रक्रिया को आसान बनाते हुए बिहार विधान मंडल ने गत मार्च में ही बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम पास करके राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए केंद्र सरकार को भेज दिया है। पर उस पर अभी तक राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिल पाई है। विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल जाए तो उसे कानून का स्वरूप हासिल हो जाएगा। उसके कारण बड़े अफसरों को भी भ्रष्टाचार से दूर रहने की मजबूरी होगी। यदि बड़े अफसर ईमानदारी से काम करने लगेंगे तो उनके जरिए गरीब बिहार के भ्रष्ट मंत्रियों पर भी काबू पाने में सुविधा होगी। यह एक प्रयोग है, जिसकी सफलता के साथ बिहार का भविष्य जुड़ा हुआ है। याद रहे कि बिहार में साधनों की कमी की समस्या जितनी गम्भीर नहीं है, उससे अधिक सरकारी साधनों की बिचौलियों द्वारा लूट की समस्या चिंताजनक है। इस समस्या के हल के लिए भी प्रयोग जारी है।
बिहार में इस तरह की जंग लड़ने की हमेशा ही जरूरत पड़ती रही है। राम-लक्ष्मण द्वारा विश्वामित्र के आश्रम से युद्ध विद्या की ट्रेनिंग हासिल करने के बाद उसके इस्तेमाल की सबसे अधिक और सबसे पहले जरूरत बक्सर में ही पड़ी थी। महात्मा बुद्घ को सबसे अधिक वर्षा-वास बिहार में ही करना पड़ा था। महावीर को अहिंसा का सबसे अधिक संदेश यहीं देना पड़ा। हाल के युग में महात्मा गांधी ने भी दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद सबसे पहले चम्पारण में ही सक्रिय होना जरूरी समझ। केंद्र से कांग्रेसी शासन के एकाधिकार की समाप्ति का बिगुल जेपी ने बिहार से ही फूंका। अब जब इस देश की राजनीति को भ्रष्टाचार, जातिवाद और परिवारवाद की बुराइयों से आजादी की सख्त जरूरत है तो वह जंग भी इन दिनों बिहार में ही हो रही है।

sukishore_patna@yahoo.co.in
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:धीरे-धीरे बिहार का मौसम बदलने लगा है