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मध्य प्रदेश: इथियोपिया को भी पीछे छोड़ा

करीब दो महीने पहले मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के सेलधाना गांव के एक भूमिहर मजदूर की बेटी रीना किशोर ने जब दम तोड़ा तो उस समय उसकी उम्र महज दो माह थी। मौत की वजह कुपोषण बतायी गई। आदिवासी आबादी वाले इस दूरदराज गांव की आंगनवाड़ी के 72 बच्चों में से 70 फीसदी कुपोषित हैं। कुपोषित बच्चों के संदर्भ में सिर्फ इस गांव के बच्चों की तस्वीर ही निराशाजनक नहीं है, बल्कि
समस्या व्यापक है। एक करोड़ बच्चों की आबादी वाले इस राज्य में 60 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं, जबकि एक दशक पहले यह संख्या 55 फीसदी थी।

राज्य की वार्षिक योजना दस्तावेज में इस तथ्य का स्पष्ट उल्लेख है कि मध्य प्रदेश में बीते दस साल में महिलाओं व बच्चों को मिलने वाला पौष्टिक आहार लगातार घट रहा है। हिन्दी पट्टी के भाजपा शासित इस राज्य की ऐसी चिंताग्रस्त स्थिति के मद्देनजर ही हाल में योजना आयोग ने अपने दस्तावेज में मध्य प्रदेश की हालत इथियोपिया से भी बदतर बताई है। तीन साल से कम आयु वर्ग के 60.3 फीसदी बच्चों का वजन न्यूनतम से कम है, जबकि इथियोपिया में यह संख्या 60.1 फीसदी है। यहां एनेमिक बच्चों की संख्या 82.6 फीसदी है, जो इथियोपिया में 48 फीसदी है। एनेमिक गर्भवती महिलाओं की संख्या इथियोपिया में 42 फीसदी है तो मध्य प्रदेश में 57.9 फीसदी। बीते वर्ष 2008 में जारी भारतीय राज्य भूख सूचकांक के अनुसार देश में सबसे ज्यादा भूखे लोग मध्य प्रदेश में हैं।

सामाजिक मानसिकता व आर्थिक व्यवस्था के कारण भूख का सबसे ज्यादा कहर महिलाओं व बच्चों पर पड़ता है। मध्य प्रदेश केशिवपुरी शहर के एक पुर्नवास केंद्र में भर्ती बच्चों की दयनीय सेहत इसका गवाह है। एक बच्चे की मां का कहना है कि उसके गांव की स्थिति बहुत ही नाजुक है। रोजगार कभी मिलता है, कभी नहीं। बच्चे ही नहीं माएं भी भूखी हैं। ऐसे सूरत-ए-हाल में एनेमिक गर्भवती महिलाओं द्वारा स्वस्थ शिशु को जन्म देने की संभावना बहुत ही क्षीण होती है। नवजात शिशु का वजन व कद न्यूनतम से कम होता है और उसमें खून की कमी भी अक्सर पाई जाती है। गर्भपात व समय से पहले प्रसव होने की आशंका भी रहती है। पौष्टिक आहार न लेने से बच्चों की पढ़ाई पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है।

डॉक्टरों का भी मानना है कि जो बच्चे बचपन से ही पूर्ण पौष्टिक आहार नहीं लेते, बड़ा होने पर उनके आईक्यू में 15 प्वॉइंट की कमी देखी गई है। इसका बच्चों की स्कूली उपलब्धियों पर असर पड़ता है और बीच में स्कूल छोड़ने या कक्षा को दोहराने का खतरा भी बढ़ जाता है। पोषण विशेषज्ञों की राय में कुपोषण के पीछे भोजन तक अपर्याप्त पहुंच, खराब बाल-देखभाल व खराब फिडिंग व्यवस्था जिम्मेदार है।अहम सवाल यह है कि मध्य प्रदेश भारत का इथियोपिया क्यों बना और इस संकट से कैसे निपटा जाए। बीत हफ्ते मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दिल्ली में योजना आयोग के अधिकारियों को एक बैठक में बताया कि राज्य में स्वास्थ्य सूचकांक की खराब स्थिति की वजह उनके राज्य में उद्योगों का बहुत कम धीमी गति से विस्तार होना है।

 राज्य में 1999-2000 में प्रति व्यक्ति आय 12,884 रुपये थी जो कि वर्ष 2007-08 में बढ़ कर 15,346 रुपये हो गई और इसी अवधि में बच्चों में कुपोषण भी बढ़ा। दरअसल राज्य के मौजूदा आंगनवाड़ी केंद्रों के हालात पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। आंगनवाड़ी में 6 साल से कम आयु वर्ग के बच्चों को पौष्टिक आहार दिया जाता है और उनका वजन भी तौला जाता है। स्थिति यह है कि राज्य के कई आंगनवाड़ियों में वजन तौलने वाली मशीनें नहीं हैं तो कहीं आंगनवाड़ी कार्यकर्ता भोजन को बेच देते हैं। कुछ आंगनवाड़ी कार्यकर्ता निचली जाति के बच्चों को भोजन देने से साफ इंकार कर देते हैं। भ्रष्टाचार व अकार्य कुशलता व्यवस्था में रुकावट है, इस सचाई से मध्य प्रदेश सरकार भाग नहीं सकती। यहां वितरित होने वाले भोजन की गुणवत्ता पर भी सवालिया निशान अक्सर लगता रहता है। इसके इलावा राज्य में इस समय अंदाजन 70 हजार से ज्यादा नए आंगनवाड़ी केंद्रों को शुरू करने की जरूरत है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को अगर अपने राज्य मध्य प्रदेश के माथे पर लगा इथियोपिया का दाग मिटाना है तो आंगनवाड़ियों में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने पर ध्यान दें और बीपीएल व अंत्योदय कार्ड धारकों की सूची में घुसपैठ कर चुके भ्रष्टाचारी लोगों को बाहर कर असल सूची पर सख्ती से अमल करवाने के लिए कदम उठाएं।

aryaa2001@rediffmail.com
 लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं

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