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आहार-विचार

आहार-विचार का असर जिन्दगी के हर पक्ष पर पड़ता है। इसलिए दुनिया के विचारकों ने मानव समाज को सलाह दी कि हिंसा को जिन्दगी का हिस्सा न बनाओ। अथर्ववेद में कहा गया है-हे मनुष्य! मांस हिंसा किए बगैर नहीं हासिल हो सकता है, इसलिए मांस का भक्षण न करो।
इसी तरह भ्रूणहत्या को भी महापाप माना गया है। कहा गया है, जो लोग मांस खाते और भ्रूणहत्या करते हैं, उनकी जिन्दगी नष्ट-भ्रष्ट होजाती है। पश्चिमी दुनिया के महान साहित्यकार और विचारक जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने आहार और आचार की शुद्धता पर जोर देते हुए कहा, संसार में उच्च श्रेणी के इंसान वे हैं, जो हिंसा के जरिए हासिल मांस की तरफ देखते नहीं। आध्यात्मिक गहराई का मनुष्य मुर्दा लाश नहीं खाता है। 
आहार-विचार की पावनता पर जोर देते हुए गुरु नानक देव ने फरमाया आपि मेरे अबरा मौरे यानी जब मनुष्य किसी प्रकार भी बल-प्रयोग और अत्याचार करता है तो अहंभाव से प्रेरित होकर करता है। जिसने अपने अहं को जीत लिया वही असल में अहिंसक है। गुरु अर्जुन देव ने फरमाया, जो परमात्मा से सच्चा प्रेम करता है, वह हंस के समान है। उसकी खुराक मोती है और बगुला की खुराक मछली और मेंढक। मतलब यदि हमारे आहार-विचार अच्छे रहेंगे तो हमारी प्रवृत्ति हंस जैसी बनेगी और यदि हमारी प्रवृत्ति बगुले जैसे बनेगी तो हम मछली और मेंढक का सेवन करेंगे। महर्षि दयानंद ने मांस भक्षण से होने वाले नुकसान को बताते हुए कहा कि मांसाहार से इंसान का स्वभाव हिंसक हो जाता है। विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्सटाइन ने आहार का विचार पर प्रभाव को स्वीकारते हुए कहा, शाकाहार का हमारी प्रकृति पर
गहरा असर पड़ता है। यदि दुनिया शाकाहार को अपना ले तो इंसान की किस्मत पलट सकती है। दुनिया के किसी भी धर्म ग्रंथ, वैज्ञानिक, विचारक और समाज सुधारक ने हिंसा को मानव स्वभाव के अनुरूप नहीं माना है। सभी ने कहा इंसान की सबसे बढ़िया स्थिति यह है कि वह अपने अनुरूप दूसरे प्राणी के सुख-दुख को समझे।

 

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