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अदालतों में अटका इंसाफ

न्याय में देरी, अन्याय के समान है- यह एक ऐसा वाक्य है, जिसे न्यायशास्त्र के ककहरे में ही पढ़ा दिया जाता है। इसी न्यायशास्त्र कीपढ़ाई करके निकले वकीलों और जजों की देश में जो व्यवस्था है, वह तकरीबन हर रोज न्याय में देरी के कीर्तिमान स्थापित करती है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को यह बुरा लग सकता है कि भारत को दुनिया में सबसे ज्यादा लंबित मामलों और देरी से न्याय का कलंक सहना पड़ रहा है। लेकिन न जाने कब से यह देश की हकीकत है और यह सिलसिला कभी खत्म भी हो सकेगा, यह उम्मीद तक लोगों ने छोड़ दी है। रविवार को प्रधानमंत्री न्याय में देरी पर चिंता जता रहे थे तो यह उन्हें भी अच्छी तरह पता होगा कि ऐसी चिंता जताने वाले वे पहले प्रधानमंत्री नहीं हैं। उन्होंने जो बात कही, वह न जने कब से कही ज रही है और इंसाफ की देरी को खत्म करने की गंभीर कोशिश कभी नहीं की गई। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के. जी. बालकृष्णन ने इस मौके पर यह जरूर कहा कि देरी की वजह निचली अदालतों में न्यायाधीशों के खाली पड़े पद हैं। यह एक वजह हो सकती है लेकिन शायद यह सबसे बड़ी वजह नहीं है, क्योंकि ऐसे सिर्फ 17 फीसदी पद ही खाली पड़े हैं, जबकि लंबित मामलों का प्रतिशत इससे कई गुना ज्यादा है।

न्याय में देरी का मामला एक तरफ तो न्यायिक, प्रशासनिक और पुलिस सुधार से जुड़ा हुआ है। ये तीनों ही मोर्चे ऐसे हैं, जिन पर काफी कुछ कहने और सुनने के बाद भी हकीकत में हम कुछ नहीं कर सके हैं। हमारी जेलों में सजयाफ्ता से ज्यादा वे कैदी हैं, जिनके मुकदमें अभी विचाराधीन हैं। न्याय में देरी को खत्म करने का मामला दरअसल इच्छाशक्ति से जुड़ा है। इंसाफ में देरी का मर्ज पुराना है और इस दौरान न्याय व्यवस्था, प्रशासन और पुलिस सभी स्तरों पर ऐसे ढेर सारे निहित स्वार्थ अपनी जड़ें जमा चुके हैं, जिनका हित इसी में है कि तुरंत न्याय का रास्ता न खुल सके। न्याय में देरी से निपटना इन हितों से टकराना भी है। इन्हीं के चलते हम उन मुकदमों को भी नमस्कार नहीं कर पाते जो बेमतलब हैं और अदालतों का समय बर्बाद कर रहे हैं। अब इस काम को बिना किसी देरी के शुरू कर दिया जना चाहिए। न्याय में देरी खत्म करने का मामला सिर्फ कार्यकुशलता बढ़ाने का मामला नहीं, यह अन्याय को खत्म करने का मामला भी है। आधुनिक अर्थव्यवस्था बनाने की मंजिल हम फिसड्डी न्याय व्यवस्था के भरोसे नहीं हासिल कर सकते।

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