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हीरो की तलाशी

बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान की अमेरिकी हवाई अड्डे पर ली गई तलाशी ने एक बवाल खड़ा कर दिया है। बॉलीवुड तो इससे खासा आहत और नाराज है। अमेरिका में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने गए शाहरुख खान को सुरक्षा जांच के लिए करीब दो घंटे रुकना इतनाअपमानजनक लगा कि उन्होंने भविष्य में अमेरिका न जाने का मन बना लिया। यह ठीक है कि शाहरुख के साथ जो हुआ वह गलत था, पर इस पर इतना वितंडा खड़ा करने की भी जरूरत नहीं थी। अमेरिका जाने वाले एशियाई मूल के लोगों के साथ पहली बार ऐसा नहीं हुआ है। इससे पहले रक्षा मंत्री रहते हुए जॉर्ज फर्नाडीस को तो अमेरिकी हवाई अड्डे पर जांच के लिए कपड़े तक उतारने पड़े थे। एक अमेरिकीएयरलाइन कंपनी ने जांच के नाम पर पूर्व राष्ट्रपति ए. पी. जे. अब्दुल कलाम से जूते तक उतरवा लिए थे और ये मामले महीनों सामने नहीं आए थे। जबकि शाहरुख केवल पूछताछ पर इतना बौखला गए। उनका आरोप है कि केवल नाम की वजह से उन्हें रोका गया, जबकि अमेरिकी आब्रजन और सीमा सुरक्षा के प्रवक्ता के अनुसार उनका सामान जांच के लिए नहीं मिला था, इसलिए उनकी जांच लंबी चली। इस बात में दम इसलिए नजर आता है कि जॉर्ज फर्नांडीस और नील नितिन मुकेश को इस धर्म विशेष से कोई ताल्लुक न होने के बावजूद सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ा था। हालांकि बाद में शाहरुख ने माना कि यह एक प्रक्रिया थी, जिसका सभी को पालन करना चाहिए। यह सच है कि अमेरिका या विदेश में कहीं भी जाने वालों को सुरक्षा जांच से गुजरना होता है। वहां कानून व नियमों का पालन करने के मामले में छोटे-बड़े सब बराबर हैं। सतर्कता और कड़ी सुरक्षा व्यवस्था का ही परिणाम है कि वहां आठ साल में 9/11 के बाद कोई हमला नहीं हुआ। भारत में आतंकवाद के पनपने और लगातार हो रहे हमलों का एक बड़ा कारण कुछ लोगों द्वारा पद और ताकत के बल पर नियमों और सुरक्षा घेरों को तोड़ना अपना विशेषाधिकार समझना है। सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता न होने पर ही उसमें बार-बार सेंध लगती है। अगर कोई नियम है तो वह सभी के लिए है। उसका पालन करने में अपमान कैसा? बेहतर हो कि दोनों देशों के बीच एक ऐसी व्यवस्था बने कि सुरक्षा जांच को लेकर कोई अप्रिय स्थिति पैदा न हो।

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