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हाथ से निकल गया एक अवसर

छह से 14 साल के बच्चों के लिए अनिवार्य और नि:शुल्क शिक्षा के अधिकार का विधेयक संसद के दोनों सदनों ने पारित कर दिया है। इस विधेयक से किस हद तक शिक्षा का अधिकार मिलेगा, इसके पक्ष और विपक्ष में काफी बहस हो चुकी है। परंतु असली बात तो यह है कि इस विधेयक द्वारा शिक्षा में आमूल परिवर्तन लाने का जो देश को मौका मिला था, उसको हम गंवा बैठे हैं।

स्कूली शिक्षा की समस्याओं पर विचार करने के सिलसिले में जो कुछ प्रश्न बार-बार उठाए जाते हैं वे हैं- शिक्षकों कीअनुपस्थिति, अभिभावकों की उदासीनता, सही पाठय़क्रम का अभाव, अध्यापन में खामियां इत्यादि। परंतु इन समस्याओं को अलग-अलग रूप में देखा नहीं जा सकता, क्योंकि इनकी जड़ें सारी व्यवस्था में फैली हैं। इसलिए व्यवस्था में आमूल परिवर्तन लाना जरूरी है। इसके लिए हमें स्कूली शिक्षा व्यवस्था की मूल समस्याओं पर गौर करना होगा। पहली मूल समस्या है प्रवेश (ऐक्सेस) की कमी। आजादी के 62 साल बाद भी हमारे देश में करोड़ों बच्चे पढ़ाई से वंचित रह जाते हैं। बिहार समान स्कूल प्रणाली आयोग (2007) के अनुमान के मुताबिक उस राज्य में स्कूल जाने की उम्र के 50 प्रतिशत यानी 3 करोड़ में से डेढ़ करोड़ बच्चों के नसीब में स्कूल जाना नहीं बदा है। पूरे देश में यह संख्या 30 प्रतिशत से कम नहीं होगी। दाखिले का अनुपात (ग्रॉस एनरोलमेन्ट रेशियो) प्रदेश का सही सूचक नहीं हो सकता। क्योंकि दाखिल बच्चों में से अधिकांश विभिन्न कारणों से बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। आधुनिकतम सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कक्षा 10 तक पहुंचते-पहुंचते 61 प्रतिशत बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी थी। बिहार में यह अनुपात 75 प्रतिशत था। इनमें से दलित और जनजाति परिवार के बच्चों का अनुपात 70 (भारत) और 90 (बिहार) प्रतिशत था। प्रवेश की समस्या के समाधान के लिए सबसे पहला कार्य होना चाहिए - अतिरिक्त स्कूलों का निर्माण, अतिरिक्त शिक्षकों की बहाली और अतिरिक्त शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थानों का निर्माण। बिहार समान स्कूल प्रणाली आयोग ने अनुमान लगाया था कि 5 से 9 साल तक सभी बच्चों को स्कूल में प्रवेश कराने के लिए 64 हजार अतिरिक्त स्कूल बनाने होंगे और 10 लाख अतिरिक्त शिक्षकों की बहाली करनी होगी। शिक्षा अधिकार विधेयक में प्रारंभिक शिक्षा सबको उपलब्ध कराने के लिए कोई भी समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है और न ही अतिरिक्त स्कूल बनाने और अतिरिक्त शिक्षकों की बहाली की योजना बनाई गई है।

शिक्षा की दूसरी मूल समस्या है, इसकी अति निम्न गुणवत्ता। इसे बढ़ाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपाय है न्यूनतम मानकों (नौर्म्स) का निर्धारण कर उन्हें सभी स्कूलों में लागू करना। शिक्षा अधिकार विधेयक की अनुसूची में कुछ मानक निर्धारित किए गए हैं। परंतु ये नितान्त अपर्याप्त हैं। अनेक अत्यावश्यक मानकों का इसमें जिक्र ही नहीं है जैसे- जन आबादी से स्कूल की दूरी, प्रति स्कूल और प्रति क्लास में छात्रों की संख्या, कक्षाओं में फर्नीचर, पाठय़-उपकरण, प्रयोगशाला का स्तर, शिक्षकों की योग्यता, प्रशिक्षण, वेतनमान एवं सेवा की शर्ते इत्यादि। कुछ मानकों का जिक्र तो है पर उनका स्पष्ट उल्लेख करने के बदले कहा गया है, ‘जैसा सरकार निर्धारित करे।’ इसका मतलब यह भी हो सकता है कि अयोग्य शिक्षकों (पैरा टीचर्स) की बहाली और बहुकक्षा पढ़ाई का मौजूदा सिलसिला जारी रहेगा। फिर तो गुणवत्ता की बात करना भी फिजूल है।
प्रवेश एवं गुणवत्ता, इन दोनों समस्याओं का असली कारण है वित्त का अभाव। शिक्षा अधिकार विधेयक से संलग्न वित्तीय स्मरण-पत्र में कहा गया है, ‘विधेयक को अमल में लाने के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधनों का परिणाम निर्धारित करना फिलहाल संभव नहीं है।’ यह कथन गलत है। पिछले 10 वर्षो में भारत के हर बच्चे को नि:शुल्क प्रारंभिक शिक्षा प्रदान करने में जो खर्च होगा उसका कई बार अनुमान लगाया जा चुका है। 1999 में तापस मजूमदार समिति ने बताया कि इसके लिएअगले 10 वर्षो में 1,37,000 करोड़ अतिरिक्त रकम लगेगी। 2005 में शिक्षा-परामर्श बोर्ड (केब) के एक विशेषज्ञ दल ने अनुमान लगाया था कि इस पर 6 साल तक प्रतिवर्ष न्यूनतम 53,500 करोड़ और अधिकतम 73 हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त व्यय होगा। फिलहाल प्रारंभिक शिक्षा के लिए सर्वशिक्षा अभियान के माध्यम से धनराशि उपलब्ध कराई जाती है। दसवीं पंचवर्षीय योजना की तुलना में करीब दोगुनी वृद्धि के बाद भी ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में सर्वशिक्षा अभियान के लिए प्रतिवर्ष करीब 30,000 करोड़ रुपए का प्रावधान है। इस रकम से न तो देश के सभी बच्चों को स्कूल में प्रवेश दिलाया जा सकता है और न गुणवत्ता में विशेष परिवर्तन लाया जा सकता है।
हमारी स्कूली शिक्षा व्यवस्था की तीसरी मूल समस्या है, इसमें व्याप्त असमानता और भेदभाव। देश के सामाजिक वर्गीकरण के साथ-साथ हमारे यहां स्कूलों का भी वर्गीकरण है, जिसके मुताबिक धनी और विशिष्ट वर्ग के बच्चे ज्यादा फी वाले अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं, और गरीब व निम्न वर्ग के बच्चे जिनकी संख्या कुल स्कूली छात्रों का करीब 80 प्रतिशत है। इसके चलते देश का सामाजिक विभाजन और भी बढ़ता जा रहा है। सभी स्कूलों में न्यूनतम मानक लागू करना न केवल शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ा सकता है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में मौजूद भेदभाव को मिटाने में भी मदद कर सकता है। भेदभाव मिटाने का दूसरा उपाय है पड़ोस के स्कूल के सिद्धांत को लागू करना जिसके मुताबिक हर स्कूल को उसके लिए निर्धारित पोषक क्षेत्र अथवा पड़ोस के सभी बच्चों को दाखिला देना होगा। इसका भी शिक्षाधिकार विधेयक में कोई प्रावधान नहीं है। बल्कि, स्कूलों के वर्तमान वर्गीकरण को कायम रखने की व्यवस्था है।
शिक्षा अधिकार कानून के द्वारा भारत सरकार एक ऐसी देशव्यापी भाषा-नीति को अमल में ला सकती थी जिसके द्वारा बच्चों की प्रतिभा के विकास के साथ-साथ देश को एकता के सूत्र में बांधा जा सकता था। किंतु हमने यह मौका भी खो दिया। विधेयक में कोई भी भाषा नीति शामिल नहीं की गई है। केवल कहा गया है, ‘शिक्षा का माध्यम यथासंभव बच्चों की मातृभाषा होगी।’ मातृभाषा की परिभाषा नहीं दी गई है। ‘यथासंभव’ शब्द का प्रयोग कर अंगरेजी माध्यम से छोटे बच्चों को भी शिक्षा देने का मार्ग खुला रखा गया है। भाषा-अध्यापन के संबंध में भी विधेयक मौन है। विधेयक के माध्यम से हम कोठारी आयोग द्वारा अनुशंसित और राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शामिल 3-भाषाई फॉर्मूला को कार्यान्वित करने के लिए नए सिरे से प्रयास कर सकते थे। पर यह भी इस विधेयक से नहीं हो सका।
मुचकुन्द दूबे
लेखक भारत के विदेश
सचिव रह चुके हैं                                                                                         

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