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उर्दू मीडिया: आतंकी को शहीद बनाती खबरें

पाक के उर्दू अखबारों के फ्रंट पेज पर एक बड़ा सा सरकारी विज्ञापन लगभग रोज छप रहा है। इसमें एक बुजुर्ग हाथ बांधे, कई फौजी असलह लिए और पाकिस्तानी झंडा फहराते दिखाया गया है। विज्ञापन का स्लोगन है..‘दहशतगर्दी के खिलाफ हर पाकिस्तानी की एक आवाज, मैं भी रखवाला हूं।’ तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के सरगना बैतुल्लाह महसूद की मौत से पैदा स्थिति स्लोगन से कतई मेल नहीं खाती। पाक मीडिया की महसूद की मौत पर सरकार से अलग राय है। हुकूमत जिसे शांति के लिए खतरा बता रही। उर्दू अखबार उसके आंदोलन को उचित ठहरा रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के कातिल का मीडिया तहजीब से नाम लेता है। ‘मिल्लत’ ने महसूद की मौत को जायज ठहराने के लिए अपने अखबार में बहस छेड़ी हुई है..ड्रोन हमला सही या गलत? इसमें हिस्सा लेने वाले सीमांत प्रांत के पूर्व चीफ सेक्रेट्री रुस्तम शाह कहते हैं,‘ एक अच्छा सपूत जाया हो गया।’ बहस में हिस्सा लेने वाले आतंकी को शहीद करार दे रहे हैं। चिंताजनक पहलू एक यह भी है। दोशद्रोही को महिमामंडित करने वाले उर्दू अखबारों को पाक सरकार टोकती भी नहीं। कई निर्दोषों का हत्यारा शहीद या सपूत कैसे हो सकता है? कोई लिख रहा है ‘अब तालिबानियों का कहर पहाड़ से उतर कर शहरों पर टूटेगा।’ किसी ने इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के हवाले से लिखा है-‘बड़ा दरख्त गिरने पर जमीन हिलती ही है।’ ‘आजकल’ अपने संपदकीय में लिखता है, अलकायदा पहाड़ों से निकलकर शहरों का रुख इसलिए करेगा, शहर ड्रोन हमले से महफूज हैं। ‘रोजनामा एक्सप्रेस’ का कहना है कि पाक फौज तालिबानों सेठीक-ठाक निपट रही थी। बिना पाकिस्तानी हुकूमत को बताए अमेरिकी ड्रोन हमला बाहरी दखल है। अमेरिका के पास महसूदके ठिकाने की जानकारी थी तो सीधी कार्रवाई करने की जगह पाक की मदद लेनी चाहिए थी। एक अखबार में सहाफी इरशाद अहमद हक्कानी ने विरोधी देशों पर बैतुल्लाह महसूद को आर्थिक और सामरिक मदद देने का इल्जाम लगाया है। बीबीसी के उर्दू पोर्टल पर ‘बैतुल्लाह महसूद कौन’ शीर्षक से उसकी पूरी जीवनी दी गई। उसके छह भाइयों में दो उसके आतंकी सरगर्मियों में शामिल रहे हैं। मीरानशाह के मदरसे में तालीम लेने से लेकर मरते दम तक वह अलकायदा के संपर्क में रहा।
पाक की तुलना में अपने देश के अखबारों ने महसूद की मौत को आम खबरों की तरह ही लिया। इसकी जगह लॉ कमीशन केएक से अधिक शादी को इस्लाम की फितरत के खिलाफ बताने पर उर्दू अखबारों के तेवर सप्ताहभर कड़े रहे। सुप्रीम कोर्ट भी एक पत्नी के रहते दूसरी शादी को दास्तां करार दे चुकी है। लॉ कमीशन ने केंद्र से सिफारिश की है कि ‘हिन्दुस्तान मेंमुस्लमानों के लिए चार निकाह के कारणों के सिलसिले में पाया जाने वाला तसव्वुर गलत है। इसलिए एक से अधिक शादी की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।’ चार शादियां, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, बाबरी मस्जिद.. कुछ ऐसे मसले हैं। जो मुसलमानों की दुखती रग बन चुके हैं।

मौलाना नदीमुल्लाह कहते हैं, मुस्लिम पर्सनल लॉ में मुदाखलत, मुसलमानों में हलचल पैदा करनेका शगल बन चुका है। इस्लाम में चार शादियों की छूट के बावजूद बहुत कम लोग इस सहूलियत का लाभ उठाते हैं। ‘जदीद खबर’ अपने संपादकीय में लिखता है, लॉ कमीशन ने मिस्र, शाम, इराक, यमन, पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे कुछ ऐसे मुल्क की मिसाल पेश की है। जहां मुसलमानों के बहुसंख्यक होने पर भी इस्लामी कानून लागू नहीं है। ऐसे मुल्क में एक से अधिक पत्नी रखने पर पाबंदी है। कमीशन को मुस्लिम देशों का नाम ही गिनाना था तो सऊदी अरब, ईरान वगैरह का गिनाता। जहां इस पर कोई पाबंदी नहीं। एक ने तो इस खबर के लिए एक अंग्रेजी समाचार पत्र की कड़ी आलोचना की है। अखबार कहता है, इस्लाम में सुविधा के बावजूद एक से ज्यादा पत्नी रखने का फायदा मुसलमान से ज्यादा दूसरे धर्म के रसूखदार लोग उठा रहे हैं। ताजा उदाहरण चांद मोहम्मद-फिजा का है। इसको लेकर मुस्लिम आलिम गुस्से में हैं। चांद-फिजा के निकाह का सर्टिफिकेट जारीकरने वाले मौलवी को मौलाना जैबुर्रहमान लुधयानवी ने ‘कट्ठमुल्ला’ घोषित कर दिया है। इस मसले पर एक अखबारसमझदारी दिखाते हुए लिखता है, अखबार में लॉ कमीशन की सिफारिशों पर छपी गई रिपोर्ट को लेकर सार्वजनिक प्रतिक्रिया जाहिर करने की बजाए आलिमों को पहले इसका अध्ययन करना चाहिए था। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इसके पहलुओं पर विचार कर सरकार को आगाह कराता। ऐसे मामले पहले भी उठाते रहे हैं। इसलिए जरूरी नहीं कि एक ही तरह के सवालों का बारबार जवाब दिया जाए।
malik_hashmi64@yahoo.com
लेखक ‘हिन्दुस्तान’ से जुड़े हैं

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