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झूमती-गाती प्रार्थनाएं

कई प्रार्थनाएं ऐसी हैं, जो झूमती हैं। ये मुक्त कंठ से गाई जाती हैं। झूमती-गाती प्रार्थनाएं भी प्रभु को उतनी ही प्रिय हैं जितनी मौनी प्रार्थनाएं। बुद्ध-महावीर ने मौन रहने की प्रार्थना की। उन्होंने अपने मौन से प्रभु को साधा। उनके प्रभु प्रेम का प्याला लबालब भरा था। मीरा-चैतन्य अपनी प्रार्थनाओं में चंचल हो उठते। उनके प्रभु प्रेम का प्याला रह-रह कर छलकने लगता था। छलकने की यह क्रिया कृष्ण को भी प्यारी लगती थी, अल्लाह को भी। ‘ऐसी लागी लगन से लेकर ‘मौला अली अली’ के बोल आज भी धरती पर जब-जब गूंजते हैं, परमात्मा के घर उसकी गूंज पहुंचती है और खुद परमात्मा भी प्रेम में झूमने लगते हैं। मीरा और चैतन्य का झूमना एक मिसाल बना। उनकी झूमती प्रार्थनाओं का अहम भाव प्रभु को इस बात के लिए धन्यवाद देना था कि तूने मुङो जितना प्यार दिया, वह जरूरत से अधिक है। ऐसा ही हाल सूफियों का था। उनकी बस एक धुन थी कि ‘मैं’ खो जाए और ‘तू’ हो जाए। सूफी संत जलालुद्दीन रुमी ने दुनियावी आदमियों को अपनी कविता के जरिए संदेशा दिया- ‘अपने अध्ययन कक्ष के द्वार खोल कर कुछ पढ़ना मत शुरू कर दो, बेहतर है कोई वाद्ययंत्र ले लो, उसके बाद बन लेने दो सौंदर्य को वह, जिसे हम प्यार करते हैं।’

रुमी के इस संदेश को हम कितना समझते हैं यह तो नहीं मालूम मगर यह सत्य प्रत्यक्ष है कि हम प्रभु प्रेम में झूमने से बचते हैं। भावों के अतिरेक में खुद को बहने नहीं देते। ओशो ने हमारी इस कमी को समझ था, इसलिए उन्होंने ध्यान जैसी क्रिया को भी झूमने से जोड़ा। लेकिन उनकी कोशिशों के बावजूद हम झूमने से, दरवेश होने से बचते रहे। यह बचना ही है कि प्रभु को प्यार करने और खुद प्रभु को प्यारे होने के बावजूद हम आत्मिक आनंद पाने से कोसों दूर हैं। यह दूरी पाटनी है तो हमें भी प्रेम का प्याला छलकाना होगा।

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