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पैसे ऐंठने का तो बस एक बहाना चाहिए

पुलिस को वर्दी दी जाती है, हथियार दिए जाते हैं, नागरिकों की रक्षा के लिए। लेकिन ये पुलिस वाले अपनी वर्दी का रौब गरीबों, कमजोर और निर्दोषों पर दिखाते हैं। जहां यह लोग अपराधियों से पैसे लेकर, उन्हें छोड़ देते हैं, गलत काम करने की आज्ञा देते हैं, वहीं निर्दोषों एवं आम जनता से किसी भी कार्य के लिए पैसे की मांग करते हैं। पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मैं अपने परिचित को छोड़ने गया था, जब हम प्रवेश द्वार से प्रवेश कर रहे थे, तभी पुलिस वाले ने रोक लिया। हमने अपना सारा सामान चेक करवाया तो भी वह हमें अंदर नहीं जाने दे रहा था, वह खर्चे-पानी की मांग करने लगा। मेरे मना करने पर वह धमकी देने लगा कि कानून से मत खेल। सवाल यह उठता है कि वे गरीब लोग जो दूसरे राज्यों से आते-जाते हैं, वे लोग कैसे बचते होंगे इन पुलिस वालों से?   

देवेन्द्र कुमार, शाहबाद डेरी, दिल्ली

दूर होता मानवीय मूल्य
हमारा देश लंबे समय तक गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा रहा था। अंग्रेजों से मिली आजादी का जश्न हम प्रत्येक वर्ष 15 अगस्त को मनाते हैं। हमारे देश में इस बार स्वतंत्रता की 62वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। समय के साथ-साथ स्वतंत्रता के मायने भी धूमिल होते जा रहे हैं। आज किसी पर्व या त्योहार पर आतंकवादी घटना की बात सोचने भर से जनता भयभीत हो उठती है। स्वतंत्रता दिवस के सुरक्षा इंतजामों को देखकर लगता है कि आज भी हम अपनी खुशी की अभिव्यक्ति स्वतंत्र रूप से नहीं कर सकते। ‘मैं’ प्रधान होता जा रहा है। हम मानवीय मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं। जिससे हमारी एकता की ताकत कमजोर होती जा रही है।

पंकज भार्गव, कंडोली, देहरादून

मुकर्रर
हर काम का
अंजाम मुकर्रर है
जिसका उदाहरण
दर-ब-दर मुशर्रफ है।
वीरेन कल्याणी, शाहदरा, दिल्ली

महिला आरक्षण बेअसर
महिलाएं राष्ट्र की प्रगति में पुरुषों की भांति अहम भूमिका निभा सकती हैं, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमारा समाज महिलाओं को किस प्रकार के अवसर प्रदान करता है। हमारे देश में ग्रामीण महिलाओं को विकास के विभिन्न क्षेत्र में आगे बढ़ने हेतु प्रोत्साहित किया जाए तो इनका राष्ट्रहित में महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। लेकिन ये महिलाएं केवल खेती व पशुपालन के क्षेत्र में ही सिमटकर रह गई हैं। ग्रामीण महिलाओं को इस दयनीय दशा से उबारने के लिए सरकार ने नई पंचायत राज व्यवस्था में महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किया है। लेकिन, देखा जाता है कि गांवों में आज जो महिलाएं पंच और सरपंच चुनी जा रही हैं उनमें से ज्यादातर परिवार के पुरुष सदस्यों के प्रभाव में काम करती हैं। इससे पंचायतों में महिला आरक्षण बेअसर हो गया है। 

सूर्यप्रकाश, रामदरबार, चंडीगढ़

जिंदगी और सलवट
जिंदगी अब हमसे
घबराने लगी है
बिस्तर की सलवट
चेहरे पे आने लगी है।

शरद जायसवाल, कटनी, मध्य प्रदेश

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