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विकास की रूपरेखा

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से किए अपने संबोधन में मुख्य रूप से समावेशी विकास और सामाजिक न्याय पर जोर दिया है। हालांकि विशिष्ट दार्शनिक अवधारणाओं को व्यक्त करने वाले यह दोनों शब्द उनके भाषण में कहीं साफ तौर पर उपस्थित नहीं हैं, लेकिन उनके सारे सरोकार और संकल्प यही भाषा बोल रहे हैं। वे भारत की तरक्की में हर नागरिक की भागीदारी की अपेक्षा ही नहीं रखते, बल्कि राष्ट्रीय संसाधनों पर हर भारतीय का हक भी जताते हैं। सैद्धांतिक तौर पर ही सही लेकिन यह बयान समाज के हर तबके और देश के हर हिस्से के भीतर एक दूसरे से जुड़ कर काम करने का उत्साह भरते हैं। लेकिन इस बात को वे मोटे तौर पर भूमिका बांधने के लिए नहीं रखते, बल्कि इस समावेशी विकास और सामाजिक न्याय का पूरा खाका पेश करते हैं। इसमें एक तरफ किसान, दलित, आदिवासी, महिला, अल्पसंख्यक और विकलांग वर्ग पर ध्यान है तो दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर, नागालैंड और मणिपुर की चिंता है। राष्ट्र निर्माण के लिए आवश्यक देश के इन विभिन्न अंगों के लिए खेती के कर्ज पर राहत, दूसरी हरित क्रांति की तैयारी, भारत निर्माण पर जोर देने, आठ जलवायु मिशन शुरू करने, खाद्य सुरक्षा अधिनियम और महिला आरक्षण विधेयक को पास कराने के संकल्प के साथ यह भी कहा गया है कि सरकार उन सामाजिक और आर्थिक स्थितियों को दूर करेगी जिनके कारण नक्सलवाद की समस्या पैदा होती है।

इसका मतलब यह नहीं कि सरकार नक्सलियों के साथ किसी तरह की नरमी बरतने जा रही है, लेकिन असंतोष की वजहें दूर करने का इरादा दमन से अलग एक व्यापक नजरिए को दर्शाता है। अपने संबोधन के छठे वर्ष में सामाजिक राजनीतिक सरोकारों में सराबोर एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री विकास के ऊंचे लक्ष्य को भूले नहीं हैं। बल्कि उनके सोच के केंद्र में वही है और तभी उन्होंने नौ फीसदी विकास दर को हासिल करने का दृढ़ संकल्प बनाए रखा है। यहां भी उन्होंने उदारीकरण, निजीकरण या भूमंडलीकरण जैसे शब्दों के बिना यह कह दिया है कि वे विकास के ऊंचे लक्ष्य को हासिल करने के लिए जो जरूरी कदम होगा, उसे उठाएंगे। जाहिर है, सरकार को साल के अंत तक मंदी के दूर होने का इंतजार है और उसके बाद वह विकास के मौजूदा मार्ग पर सबको साथ लेकर तेजी से कदम बढ़ा सकेगी।

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