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मुश्किल में मुशर्रफ

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। मुश्किल यह है कि पाकिस्तान की राजनीति इतनी अस्थिर है कि किसी एक महत्वपूर्ण शख्सियत पर संकट देश की राजनैतिक व्यवस्था का संकट बन जाता है। जो पाकिस्तान के मित्र हैं और जिनकी पाकिस्तान से विशेष मित्रता नहीं भी है, वे नहीं चाहेंगे कि अभी पाकिस्तान नए राजनैतिक संकट में घिरे। मुशर्रफ पर संकट के पीछे दो लोग हैं और दोनों प्रसंगवश इस वक्त पाकिस्तान के सबसे लोकप्रिय व्यक्ति होंगे। पहले व्यक्ति हैं, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इफ्तेखार चौधरी और दूसरे हैं, नवाज शरीफ। दोनों की मुशर्रफ से कोई मित्रता नहीं है। इफ्तेखार चौधरी की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने मुशर्रफ के 2007 में अस्थायी संवैधानिक प्रावधान के आदेश को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। नवाज शरीफ चाह रहे हैं कि 1999 में मुशर्रफ के हाथों नवाज शरीफ के तख्तापलट को लेकर मुशर्रफ पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चले। न्यायपालिका और शरीफ दोनों मिलकर काफी मजबूत ताकत बन जाते हैं और राष्ट्रपति जरदारी और प्रधानमंत्री गिलानी के लिए उनकी उपेक्षा करना कठिन हो सकता है। लेकिन अगर वे मुशर्रफ के खिलाफ इस मोर्चाबंदी को स्वीकार कर लेते हैं तो वे खुद राजनैतिक रूप से कमजोर हो जाएंगे।

जरदारी और गिलानी का जनाधार और लोकप्रियता बहुत नहीं है और दूसरी ओर उन्हें मुशर्रफ के साथ हुए समझोते को भी निभाना है। पाकिस्तान में सेना भी यह पसंद नहीं करेगी कि उसके एक पूर्व सेनाध्यक्ष को जेल की हवा खानी पड़े। नवाज शरीफ का गणित यह भी है कि अलोकप्रिय पूर्व राष्ट्रपति का विरोध करने से उनकी अपनी लोकप्रियता बढ़ेगी और इससे मुशर्रफ की राजनैतिक पार्टी पीएमएल (क्यू) भी कमजोर होगी, जो वक्त बेवक्त पीपीपी सरकार को टेका दे सकती है। दिक्कत यही है कि पाकिस्तान में संवैधानिक संस्थाएं और रिवायतें इतनी मजबूत नहीं हैं कि इतनी राजनैतिक उथल-पुथल बरदाश्त कर सकें। अगर यह मामला आगे बढ़ा तो फिर अमेरिका के लिए भी इस उथल-पुथल को थामना मुश्किल हो सकता है, जिसका पाकिस्तान की स्थिरता में शायद पाकिस्तानियों से ज्यादा रुचि है।

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