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बॉस से पटरी

ऑफिस में कौन सही है? आप या आपके बॉस? इस शाश्वत सवाल का स्थायी जवाब यही है कि अगर ऑफिस में चैन से काम करते रहना चाहते हैं, तो बॉस के साथ पटरी बैठा कर ही चलिए। मगर इसके लिए दोनों पक्षों की भागीदारी की प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। इसके तहत बॉस को मातहत को, और मातहत को बॉस को समझने के लिए अच्छा-खासा वक्त लगाना पड़ता है।

इसके बाद, जब दोनों एक पटरी पकड़ कर ‘कम्फर्ट जोन’ में आ जाते हैं, तो दोनों को ही बहुत आसानी हो जाती है। मगर फिर भी कभी-कभी मुश्किल हालात पैदा हो जाते हैं, जिन्हें वक्त रहते सुलझा लेने से माहौल कूल बना रहता है।

ऐसे मुश्किल हालात से ऐसे निकला जा सकता है -
- साफ-साफ बात करने से सब संकट हल हो जाते हैं। लेकिन बात करने का भी ढंग होता है। सीधे किसी की गलतियों को सार्वजनिक तौर पर इंगित करना या मजाक उड़ाना ठीक नहीं होता। अपनी बात सकारात्मक तरीके से कहनी चाहिए। इमोशनल होने से परहेज करें।

- गलत समय पर सही बात भी न करें। बॉस का मूड जब पहले से खराब हो, तो हल की उम्मीद न करें। बॉस को भी आपका पक्ष सुनते समय शांत रहना चाहिए। यानी सही समय पर ही सही बात करने से सही हल निकल सकता है।

- कटाक्ष या कहासुनी के अंदाज में कही गई बात का अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता, समस्या का हल होना तो दूर की बात है। इसके बजाय विनम्रता और संवेदनशीलता के साथ कही गई बात अच्छा प्रभाव छोड़ती है। 

- मुश्किल हालात से निकलने के लिए पहल करना कामयाबी की गारंटी साबित होता है। बैठकर गंभीरता से सोचें कि इस समस्या का हल कैसे हो सकता है? लिखित में कुछ न दें। इसे बॉस अपने खिलाफ साजिश मान सकते हैं। इसका नतीजा अच्छा नहीं होगा।

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