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कैलाश मानसरोवर: शिव से साक्षात्कार

कैलाश मानसरोवर:  शिव से साक्षात्कार

इस विशालकाय झील की खूबसूरती का बखान करना शब्दों में संभव नहीं है। मानसरोवर रेगिस्तान के बीचोंबीच चमकते किसी रत्न सरीखी है। धूप में चमकती हरे-नीले रंग की लाखों रश्मियां मानो आसमान के घड़ी-घड़ी बदलते परिदृश्य को चुनौती देती हैं। प्रहरी की तरह खड़ी चट्टानों से घिरी मानसरोवर, और इस अनूठे दृश्य को और भव्य बनाता, धवल शिखर कैलाश पर्वत। इस खूबसूरती को कैद करने में कैमरे भी नाकाफी थे। इस सौंदर्य का साक्षी बने बिना इसकी कल्पना नहीं की जा सकती।

मानसरोवर में पवित्र डुबकी यहां की सबसे खास बात थी। हिंदुओं में मान्यता है कि इस एक डुबकी से कई जन्मों के पाप धुल जाते हैं। हमारा कार्यक्रम अगली सुबह सद्गुरु की उपस्थिति में सामूहिक स्नान का था। भले ही धार्मिक कारणों से नहीं, लेकिन मैं भी इस झील में डुबकी लगाना चाहती थी मगर सुबह होने तक मुझे अपने इस फैसले पर शंका होने लगी।

मानसरोवर आमतौर पर हर वक्त, और खासकर सुबह और रात के दौरान बेहद ठंडी होती है। सुबह 6 बजे जब हम इसके किनारे पर जमा हुए तो उस वक्त मैं एक के ऊपर एक, पांच-पांच कपड़े लादे हुए ्थी।  तापमान दो से पांच डिग्री सेल्सियस के बीच रहा होगा मगर हवा की ठंडक -5 डिग्री सेल्सियस से कम नहीं थी। मैंने दो जोड़ी मोजे चढ़ा रखे थे और जूतों की बजाय चप्पलें पहनकर वहां पहुंची थी। इतनी ऊंचाई पर चढ़ाई वाले भारी-भरकम जूते पहनना कम मशक्कत का काम नहीं है। वैसे भी डुबकी लगाते वक्त जूते तो उतारने ही पड़ते इसलिए इन्हें पहनने का कोई मतलब भी नहीं था।

यह गलती बड़ी भारी थी। जबतक सद्गुरु और उनकी टोली ने अपनी ध्यान प्रक्रिया पूरी की मैं ठंड से अकड़कर मानो बर्फ हो चुकी थी। मैंने खुद को समझया और क्योंकि मैं किसी धार्मिक मान्यता से भी नहीं बंधी थी इसलिए बर्फीले पानी में डुबकी लगाने का खयाल अपने मन से निकाल दिया। मन ही मन फैसला किया कि अपनी बढ़िया गर्म जैकेट में दुबककर मैं बाकी सबको जमते हुए देखूंगी। इसके बाद सब उठे और प्लास्टिक की थैलियों में अपने-अपने कपड़े लेकर झील की तरफ बढ़ गए। इसमें 50, 60 और सत्तर वर्ष तक की उम्र के दक्षिण भारतीय लोग भी शामिल थे।

अब डुबकी लगाने का मुद्दा नाक का सवाल बन गया। मैंने सोचा कि अगर दक्षिण भारत के लोग, जो आसमान में बादल घुमड़ने पर भी बंदरटोपियां डाट लेते हैं, डुबकी लगा सकते हैं तो मैं भी लगा सकती हूं। मैंने अपने पाजामे और टी-शर्टें उतार फेंकी, बुरी तरह कांपते हुए कल्पना (जोकि इस सफर के दौरान मेरी अच्छी दोस्त बन गई थी) का हाथ थामा और बातें करते हुए ङील की तरफ चल दी।

पहले 30 सेकेंड एकदम झन्ना देने वाले थे। पानी करीब-करीब जमाव बिंदु तक ठंडा था। मुझे लगा कि मेरा पैर काई जैसी किसी चीज में उलझ गया है। मगर 30 सेकेंड के बाद मुझे ठंड लगनी होनी बंद हो गई। दरअसल, मैं अब अपने पैरों को महसूस भी नहीं कर पा रही थी। मैंने अपने मन को मजबूत किया और सिर्फ सिर को पानी से ऊपर रखते हुए गहरे उतर गई। इसके बाद तो कमाल ही हो गया। जब किनारे खड़े एक अन्य यात्री ने पूछा कि मैने यह कैसे किया तो किसी अनुभवी व्यक्ति की तरह मैं सलाह देने लगी, ज्यादा सोचो-विचारो मत, बस कूद पड़ो।’ उसने ऐसा ही किया। कई और तीर्थ यात्री पानी में इस तरह उतरते गए मानो वे बर्फीले पानी में नहीं बल्कि मनोरम समुद्री तट पर स्नान कर रहे हों।

हमारा बाकी दिन जमे हुए पांवो को सहलाते और आगे की चढ़ाई से पहले आराम करते हुए बीता। अगले रोज जोरदार, पौष्टिक नाश्ता करने के बाद हम कार से उस जगह पहुंचे जहां से दिरापुक तक 10 किलोमीटर की चढ़ाई करनी थी।  13 वीं शताब्दी के पुरातन मठ वाली दिरापुक वह जगह है जहां से कैलाश पर्वत के उत्तर-पश्चिमी मुख के दर्शन होते हैं। नदी के किनारे सद्गुरु के प्रवचन के बाद चढ़ाई शुरू हुई।
यह रास्ता हमें मनोरम झंकियों में ले चला। हम जिस जगह से गुजर रहे थे वह ग्रेंड कैनियन की छोटी प्रतिकृति जैसा था।  इसकी चोटियों और घाटियों को तेज हवाओं ने घिस-घिसकर अजीब कोमलता से भर दिया था। यह लहरदार चढ़ाई उतनी दुरूह नहीं थी जितना मैंने सोचा था। धीरे-धीरे हम 14,300 फुट की ऊंचाई से चढ़ते-चढ़ते 16,100 फुट की ऊंचाई पर आ गए। हम चार-चार की टोलियों बंटे थे और सबके पास छोटी ऑक्सीजन कैन थीं ताकि अगर कहीं दम फूलने लगे तो मदद ली जा सके। मगर मैं यह देख कर खुश थी कि कुलियों की मदद लिए बगैर अपना पिट्ठू-बैग खुद लादे होने पर भी बात करते करते हांफने वाली इस लड़की को, जिसने योग-ध्यान किया ही नहीं, अतिरिक्त ऑक्सीजन की कोई जरूरत नहीं पड़ी। वाह क्या बात है! मेरे फेफड़े एकदम तंदुरुस्त हैं।

दिरापुक में एक नए बने आश्रम (पिछले साल तीर्थयात्री यहां शिविरों में रहे थे)  में हम रात भर ठहरे। अगले दिन हम ध्यान-सत्र के लिए कैलाश पर्वत की एक धार की तरफ बढ़ लिए। यह काफी खड़ी चढ़ाई थी। पर्वतारोही अपने आस-पास के शिलाखंडों और कैलाश शिखर से फिसलकर आई, धार के किनारे फैली बर्फ से भी बतियाते चल रहे थे। अपनी टोली के स्वामी उल्लास की अगुआई में हम लोग ध्यान सत्र के लिए रुके। कैलाश पर्वत के साक्षात्कार का यह सबसे करीबी मौका था। 

जैसे ही ईश ध्यानियों ने शाश्वत योगी शिव की आराधना शुरू की मैंने भी अपनी आंखें बंद कर लीं। मैं 16,500 फुट की ऊंचाई पर थी। मैं वहां थी जहां जाने के लिए न जाने कितने लोग हाथ-पैर मारते हैं। मुङो यह मौका मिला इसके लिए मैं कृतज्ञता से भर उठी। इर्द-गिर्द, श्रद्धालुओं के भक्तिभाव से घिरी और अपने आमने अभिभूत करने वाली खूबसूरती को निहारती हुई मैं ऊपर वाले को शुक्रिया अदा कर रही थी कि घर से यहां तक सब कुछ ठीक-ठाक निपठ गया। ठंड से सिहरती हुई में बुरी तरह थक चुकी थी लेकिन एक बड़ी शिला से पीठ टिकाए प्रार्थना कर रही थी।

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