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ख़बरों में खौफ़ बांटने की बीमारी

क्या स्वाइन फ्लू पर मीडिया का कवरेज गैरजिम्मेदार और सनसनीखेज रहा? या उसने अपना काम ठीक से किया? इसमें से जो भी हुआ पर मीडिया वायरस पर काबू पाने में सरकार की लापरवाही को उजागर करने की कोशिश कर रहा था। पिछले हफ्ते दिल्ली में स्वास्थ्य सचिव नरेश दयाल ने मीडिया से अनुरोध किया कि वह एच1एन1 की खबरें देते हुए पूरे परिप्रेक्ष्य का ध्यान रखे। उनका कहना था कि कई दूसरे रोग इससे कहीं ज्यादा घातक हैं। भारत में टीबी और मलेरिया वगैरह से इससे कहीं ज्यादा लोग मर जाते हैं, यहां बाल मृत्यु दर एक हजार में 50 है, लेकिन मीडिया इस पर कभी हंगामा नहीं करता।
मुंबई में मुख्यमंत्री अशोक चौव्हाण ने भी थोड़े अलग ढंग से ऐसी ही बात कही। उन्होंने कहा कि मीडिया वायरस से मरने वालों की खबरें तो बढ़ा चढ़ाकर दिखा रहा है, लेकिन उन लोगों के बारे में नहीं बता रहा जो संक्रमण के साथ अस्पताल में आए और फिर ठीक होकर घर पहुंच गए। दोनों की ही बातों का अर्थ यही था कि जो हो रहा है और जो दिखाया जा रहा है, उसमें काफी फर्क है। जिसका अर्थ हुआ कि मीडिया इस रोग के कवरेज में न सिर्फ गलत था, बल्कि पूर्वाग्रह से ग्रस्त भी था, उसने अपनी टीआरपी और पाठक संख्या बढ़ाने के लिए आतंक का वातावरण बनाया।
हम जानते हैं कि मीडिया को आतंक का माहौल बहुत भाता है, खासतौर पर चौबीसों घंटे चलने वाले चैनलों को। इसमें अतिश्योक्ति और उन्माद फैलाने का बहुत सा मसाला मिल जता है। इसलिए जब पुणे में स्वाइन फ्लू की वजह से जब रिदा शेख का निधन हुआ तो मीडिया को चीखने और चिल्लाने का मौका मिला गया। तुरंत ही वायरस का मिनट दर मिनट कवरेज होने लगा। अस्पतालों के बाहर सजिर्कल मास्क लगाए रिपोर्टरों ने जब कैमरे पर हालात को बयान करना शुरू कर दिया तो लगा कि जैसे भारत की जनस्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई है। इस माहौल में मीडिया में अपनी शक्ल दिखाने को आतुर डॉक्टर और अस्पताल भी कूद पड़े, उनके लिए प्रचार पाने का यह अच्छा मौका था। दवा बनाने वाली कंपनियां, सजिर्कल मास्क के उत्पादक और यहां तक कि दूरसंचार कंपनियां भी मौके का फायदा उठाने के लिए सक्रिय हो गई। स्वाइन फ्लू की जानकारी के लिए मीडिया नेटवर्क को सैकड़ों एसएमएस मिलने शुरू हो गए।

अगर आप टेलीविजन पर नियमित रूप से खबरों को देखते हैं तो आपने भी इस पर गौर किया होगा कि किस तरह तबाही की शब्दावली दिखने लगी, भावुक किस्म की कल्पनाशीलता दिखने लगी, नेटवर्क भय और उन्माद फैलाने में कामयाब रहे। बार-बार दिखाई देते दुखी रिश्तेदार, चेहरे पर मास्क लगाए लोग, सब कुछ इसीलिए था। इस सबके चलते लोग बेतहाशा अस्पतालों की ओर दौड़े, जिनके लिए भीड़ से निपटना मुश्किल हो गया था।
लोग कैसा व्यवहार करते हैं, यह इस पर निर्भर करेगा कि आप कैसे खबर दिखाते हैं। यह लोगों को आश्वस्त करने का माध्यम बन सकता था, लेकिन यह लोगों में हड़कंप मचाने वाला मीडिया बन गया। और पुराने ढंग की संतुलित रिपोर्टिग वाली सोच का क्या हुआ? लोगों को यह पता चलना चाहिए कि एक हफ्ते में 18 लोग मर गए, लेकिन यह भी तो पता लगना चाहिए कि कितने बच गए।
इस मामले में अखबार थोड़े उदार रहे। हालांकि उनकी हेडलाइन भी टेलीविजन पर जो दिख रहा था उसी को दोहराती रहीं। मुंबई के एक अखबार ने तो स्वाइन फ्लू की तुलना 26 नवंबर के आतंकवादी हमले से कर दी, सिर्फ पाठकों को आकर्षित करने के लिए। दिलचस्प बात यह है कि इतने हो-हंगामें के बाद भी ऐसा नहीं था कि लोगों को पर्याप्त जानकारियां मिल गई हों। क्या यह वायरस, सार्स या बर्ड फ्लू से ज्यादा खतरनाक है? यह बताने की कोशिश किसी ने नहीं की।
मीडिया का जिस तरह का प्रभाव है, उसके बाद उसे शांत, आश्वस्त करने वाला, जानकारी देने वाला और रचनात्मक होना चाहिए। उसे सराकर की गलत नीतियों की ओर ध्यान दिलाना चाहिए था, जो रोग को रोकने में कामयाब नहीं हो सकीं। उसे साफ-सफाई का संदेश देना चाहिए था। लोगों को व्यवहारिक जनकारी देना ज्यादा बड़ी जनसेवा होता। इससे लोगों को लगता कि चीजें नियंत्रण में हैं। इसके बजाए मीडिया ने अपना सारा ध्यान स्वाइन फ्लू की वजह से मरने वालों की संख्या पर ही लगा दिया। जिससे लोग बेवजह आतंकित हो गए और नाउम्मीदी का एक माहौल बन गया।

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