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भारत कुमार पर गर्व है मुझे

भारत कुमार पर गर्व है मुझे

निर्माता-निर्देशक और अभिनेता मनोज कुमार द्वारा बनाई गयी देशभक्ति पर आधारित फिल्मों को कौन भूल सकता है। आजादी के बाद विदेशों में जा बसे भारतियों में देशभक्ति का जो जज्बा उन्होंने 70 के दशक में जगाया, उसकी यादें आज भी बहुतेरे देशवासियों के दिलों में ताजा हैं। आजादी के इस  मौके पर आज मनोज कुमार अपनी कलम से कुछ कहना चाह रहे हैं।

भारत का 62वां आजादी दिवस, एक फिल्म निर्देशक के तौर पर मेरे लिए काफी मायने रखता है। फिल्मी करियर के पचास सालों में मेरी प्रतिष्ठा एक राष्ट्रवादी फिल्म निर्माता के तौर पर स्थापित हुई है। मैं खुद को गर्व से ‘भारत’ कहता हूं। एक व्यक्ति के तौर पर यह नाम मेरे लिए काफी मायने रखता है, क्योंकि इस नाम में भारतीय मिट्टी  का सार है। मैं इस माटी का बेटा कहलाने में गर्व महसूस करता हूं।

1947 में जो आजादी हमें हासिल हुई थी, उसने हमारी आत्मा में अनेक ऊंची आशाएं पैदा की थीं। हमने ऐसे भारत का सपना देखा था, जो कि संसार का सबसे महान देश हो, जो कि दुनिया के उच्च विकसित देशों को भी पीछे छोड़ता हो। हमारे लिए भारत अनगिनत लाखों लोगों की सपनों की धरती थी, जो अपने जीवन में कुछ लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं।  पर जैसे-जैसे दिन और साल बीते, झुंझलाहट बढ़ती गई।    

 इस आजादी को हम वास्तविकता में आजादी नहीं कह सकते। यह आजादी सिर्फ कुछ ही लोगों के लिए थी, जिन्होंने  अपने पद और सत्ता का फायदा उठाया। यह कुछ नौकरशाहों की आजादी थी, जो लाल फीताशाही में शामिल थे और अपने हितों के लिए गरीबों का शोषण कर रहे थे। यहां तक कि आज भी, राष्ट्र की अधिकतम जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे है। सरकार द्वारा स्पेशल इकोनॉमिक जोन बनाए जा रहे हैं, जो कि औद्योगिक विकास के लिए जोर-जबरदस्ती से ली गई किसानों की जमीन पर बन रहे हैं, जिसके मैं कतई खिलाफ हूं।

मुख्यतौर पर हमारा देश एक  कृषि प्रधान देश है। देश के सबसे अमीर भारतीय उस भोजन और अनाज पर पल रहे हैं, जो कि गरीब और पिछड़े किसानों द्वारा उपजाया जा रहा है। उनके लिए उनकी फिक्र सबके सामने है।  शहरी भारत अपने अर्ध ग्रामीण और ग्रामीण भाग से हिस्सा करता है।

वर्तमान में महानगरों में रहने वाला युवा मल्टीप्लेक्स कल्चर से प्रभावित है, जो कि राष्ट्रवादी भावनाओं, देश के इतिहास के प्रति गौरव आदि बातों से दूर है। उससे अधिक उसमें देश के लोगों के प्रति ही घृणा की भावना है। दुनिया के किसी और देश में यहां की तरह शहरी लोग ग्रामीण समाज को निचली दृष्टि से नहीं देखते। बड़े विकसित देशों जैसे अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस में भी गांव उपेक्षा के शिकार हैं, परंतु इतने भयंकर रूप से नहीं, जैसा कि भारत में है। अन्यथा, आप कैसे इस बात को समझ सकते हैं कि महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में अनेक किसान आत्महत्या कर रहे हैं? एक फिल्म निर्माता के रूप में अपनी सीमा में रहते हुए, ‘शहीद’,  ‘उपकार’ और ‘पूरब और पश्चिम’ फिल्म में जहां तक संभव था, मैंने ग्रामीण भारत को सम्मानजनक तरीके से दिखाया है। मेरे लिए, भारत की आत्मा उसकी कृषि भूमि में है। 72 साल की उम्र में मैं एक और आजादी दिवस का साक्षी बनने जा रहा हूं।

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