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भारत का रहने वाला हूं..

भारत का रहने वाला हूं..

चेतन आनंद की ‘हकीकत’, मनोज कुमार की ‘पूरब पश्चिम’ और ‘उपकार’ से लेकर ‘क्रांति’ सरीखी फिल्मों के दिल को छू लेने वाले गीत हर बार स्वाधीनता दिवस पर सुनाई देते हैं। लता जी का ऐ मेरे वतन के लोगों.. इस मौके पर आंखें नम करने के लिए काफी है। लेकिन आज हम कुछ ऐसी फिल्मों की प्रासंगिकता का जिक्र करने जा रहे हैं, जिन्होंने बीते कुछ वर्षो में बॉलीवुड में देश प्रेम की भाषा को नया जन्म दिया है। कुछ पुरानी देशभक्ति की फिल्मों के हवाले से अगर लिखने बैठें तो बीते कुछ वर्षो की फिल्मों ने भारत की आजादी के मायने को काफी विस्तार और मौजूदा हालातों से जोड़ कर पेश करने का काम किया है। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि रिश्तों, प्रेम संबंधों और पारिवारिक फिल्मों पर आधारित जिन फिल्मों में देशभक्ति को एक इनपुट की तरह इस्तेमाल किया गया था, उन्हें भी दर्शकों ने बेहद पसंद किया। बॉलीवुड ने ऐसी फिल्मों में देशप्रेम दर्शा कर इंडिया की खूब ब्रांडिंग की, जिससे बॉलीवुड विदेशों में लोकप्रिय हुआ और भारत में मालामाल भी। जरा याद कीजिये करण जहर की फिल्म ‘कभी खुशी कभी गम’ का वो दृश्य, जिसमें काजोल अपने बच्चे को स्कूल के वार्षिक समारोह में राष्ट्रीयगान सुनाने के लिए तैयार करती है। बच्चे के मुख से जब डो रे मी.. के स्थान पर  भारतीय राष्ट्रीय गान सुन कर जब वह गदगद हो उसे अपनी बांहों में भरने के दौड़ती है तो ‘आनंदमठ’ का गीत वंदे मातरम.. बैकराउंड में बजता है। यह सीन विदेशों में बसे एनआरआई भारतियों के दिल में तीर की तरह घुसा और आंखें नम कर गया। यह कोई देशभक्ति पर आधारित फिल्म नहीं थी, लेकिन फिल्म का यह एक सीन आज भी विदेशी धरती पर झंडा गाड़ने का अहसास करा जाता है। ‘चक दे इंडिया’ को ही लीजिए। फिल्म भारतीय महिला हाकी टीम पर बेस्ड थी, लेकिन हृदय में बसा था भारत। फिल्म के नायक कबीर खान का लक्ष्य अपने माथे से कलंक धोने के साथ-साथ महिला हाकी को विश्व चैंपियन बनाना भी था। फिल्म के पोस्टरों में दिखाई देता तिंरगा इसका गवाह है।

अपनी फिल्म के लिए दिमाग घर पर रख कर आने की सलाह देने वाले अक्षय कुमार की ‘नमस्ते लंदन’ का वो सीन याद कीजिए, जिसमें वह कैटरीना कैफ के मंगेतर और रिश्तेदारों की सहज हिन्दी में धज्जियां उड़ाते हैं। लोगों को वह सीन देख 1970 की ‘पूरब पश्चिम’ की याद आ जाती है। भारत का रहने वाला हूं.. स्पिरिट 29 साल बाद भी उसी फॉर्म में दिखाई देती है। मोटे तौर पर कहा जाए तो भरतीय दर्शकों के सामने देशभक्ति से ओत-प्रोत फिल्मों से परे जब भी किसी फिल्म में भारत की एकजुटता, अनेकता में एकता, सभ्यता और संस्कृति की बात आती है तो वह तहेदिल से उसे स्वीकारते हैं। राकेश ओमप्रकाश मेहरा की ‘रंग दे बसंती’ आज के युवाओं की कहानी थी, जो मस्ती में तो चूर हैं ही, लेकिन जब बात देश की व्यवस्था और भष्ट्राचार में सने समाज, कानून और राजनीति की आती है तो वह क्रांतिकारी हो जाता है। आमिर खान की ‘लगान’ में अंग्रजों के जुल्म और अन्याय के बीच एक गांव के गरीब किसानों की कहानी में क्रिकेट का लोगों ने जम कर मजा लिया। लेकिन जब जब फिल्म में अंग्रेजी हुकूमत की विभिन्न किरदारों ने धज्जियां उड़ाईं तो उनका खून भी खौला। खौलता खून जब रगों में दौड़ा तो सिनेमा हाल में सीटियां बजीं और तालियों की बौछार हुई। ‘लगान’ और सनी देओल ‘गदर’ का एक ही दिन रिलीज होना इस बात का भी सबूत है कि दर्शक एक साथ दो ऐसी फिल्मों को भी हिट करा सकते हैं, जिनमें देशप्रेम कूट कूट कर भरा हो। ‘गदर’ में इंटरवल के बाद सनी देओल पूरी तरह से हिन्दुस्तानी रंग में दिखाई देते हैं। जब वह पाकिस्तानी अवाम के बीच हिन्दुस्तान जिन्दाबाद था, हिन्दुस्तान जिन्दाबाद है और हिन्दुस्तान जिन्दाबाद रहेगा का नारा लगाते हैं तो दर्शक उछल पड़ते हैं। इस सीन पर ग्रामीण इलाकों के दर्शकों ने अपनी पगड़ियां उछालीं और मल्टीप्लेक्स दर्शक भी सीटियां बजाते दिखे। पर ‘स्वदेस’ के साथ ऐसा नहीं हुआ।  ‘लगान’ के बाद कंट्री फील को ध्यान में रखते हुए मौजूदा फ्लेवर के साथ आशुतोष गोवारिकर ने ‘स्वदेस’ में नासा की नौकरी छोड़ देने वाले शाहरुख खान को दिखाया। उसके और गांव वालों के साङो प्रयास से गांव में बिजली आ जाती है, पर फिल्म पिट जाती है। ‘स्वदेस’ में ‘लगान’ और ‘गदर’ जैसे गीत और डायलॉग नहीं थे, पर दर्शक उस मकसद की कद्र भी करना भूल गये, जिसे किसी सूट-बूट वाले एनआरआई ने देखा होगा। देश प्रेम को ही सवरेपरि मानते हुए विदु विनोद चोपड़ा ने ‘1942 ए लव स्टोरी’ बनाई और फरहान अख्तर ने ‘लक्ष्य’, जिसमें मस्तमौला करण शेरगिल (रितिक रोशन) बेमकसद फौज में भर्ती हो जाता है, पर देश की सीमा पर आकर उसे अपना मकसद मिलता है। ‘ए वेडनस डे’, ‘मुंबई मेरी जान’ और ‘आमिर’ भी कुछ हटके कही जाने वाली फिल्में हैं, जिनमें देश प्रेम की झलक मिलती है।चेतन आनंद की ‘हकीकत’, मनोज कुमार की ‘पूरब पश्चिम’ और ‘उपकार’ से लेकर ‘क्रांति’ सरीखी फिल्मों के दिल को छू लेने वाले गीत हर बार स्वाधीनता दिवस पर सुनाई देते हैं। लता जी का ऐ मेरे वतन के लोगों.. इस मौके पर आंखें नम करने के लिए काफी है। लेकिन आज हम कुछ ऐसी फिल्मों की प्रासंगिकता का जिक्र करने जा रहे हैं, जिन्होंने बीते कुछ वर्षो में बॉलीवुड में देश प्रेम की भाषा को नया जन्म दिया है। कुछ पुरानी देशभक्ति की फिल्मों के हवाले से अगर लिखने बैठें तो बीते कुछ वर्षो की फिल्मों ने भारत की आजादी के मायने को काफी विस्तार और मौजूदा हालातों से जोड़ कर पेश करने का काम किया है। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि रिश्तों, प्रेम संबंधों और पारिवारिक फिल्मों पर आधारित जिन फिल्मों में देशभक्ति को एक इनपुट की तरह इस्तेमाल किया गया था, उन्हें भी दर्शकों ने बेहद पसंद किया। बॉलीवुड ने ऐसी फिल्मों में देशप्रेम दर्शा कर इंडिया की खूब ब्रांडिंग की, जिससे बॉलीवुड विदेशों में लोकप्रिय हुआ और भारत में मालामाल भी। जरा याद कीजिये करण जहर की फिल्म ‘कभी खुशी कभी गम’ का वो दृश्य, जिसमें काजोल अपने बच्चे को स्कूल के वार्षिक समारोह में राष्ट्रीयगान सुनाने के लिए तैयार करती है। बच्चे के मुख से जब डो रे मी.. के स्थान पर  भारतीय राष्ट्रीय गान सुन कर जब वह गदगद हो उसे अपनी बांहों में भरने के दौड़ती है तो ‘आनंदमठ’ का गीत वंदे मातरम.. बैकराउंड में बजता है। यह सीन विदेशों में बसे एनआरआई भारतियों के दिल में तीर की तरह घुसा और आंखें नम कर गया। यह कोई देशभक्ति पर आधारित फिल्म नहीं थी, लेकिन फिल्म का यह एक सीन आज भी विदेशी धरती पर झंडा गाड़ने का अहसास करा जाता है। ‘चक दे इंडिया’ को ही लीजिए। फिल्म भारतीय महिला हाकी टीम पर बेस्ड थी, लेकिन हृदय में बसा था भारत। फिल्म के नायक कबीर खान का लक्ष्य अपने माथे से कलंक धोने के साथ-साथ महिला हाकी को विश्व चैंपियन बनाना भी था। फिल्म के पोस्टरों में दिखाई देता तिंरगा इसका गवाह है।

अपनी फिल्म के लिए दिमाग घर पर रख कर आने की सलाह देने वाले अक्षय कुमार की ‘नमस्ते लंदन’ का वो सीन याद कीजिए, जिसमें वह कैटरीना कैफ के मंगेतर और रिश्तेदारों की सहज हिन्दी में धज्जियां उड़ाते हैं। लोगों को वह सीन देख 1970 की ‘पूरब पश्चिम’ की याद आ जाती है। भारत का रहने वाला हूं.. स्पिरिट 29 साल बाद भी उसी फॉर्म में दिखाई देती है। मोटे तौर पर कहा जाए तो भरतीय दर्शकों के सामने देशभक्ति से ओत-प्रोत फिल्मों से परे जब भी किसी फिल्म में भारत की एकजुटता, अनेकता में एकता, सभ्यता और संस्कृति की बात आती है तो वह तहेदिल से उसे स्वीकारते हैं। राकेश ओमप्रकाश मेहरा की ‘रंग दे बसंती’ आज के युवाओं की कहानी थी, जो मस्ती में तो चूर हैं ही, लेकिन जब बात देश की व्यवस्था और भष्ट्राचार में सने समाज, कानून और राजनीति की आती है तो वह क्रांतिकारी हो जाता है। आमिर खान की ‘लगान’ में अंग्रजों के जुल्म और अन्याय के बीच एक गांव के गरीब किसानों की कहानी में क्रिकेट का लोगों ने जम कर मजा लिया। लेकिन जब जब फिल्म में अंग्रेजी हुकूमत की विभिन्न किरदारों ने धज्जियां उड़ाईं तो उनका खून भी खौला। खौलता खून जब रगों में दौड़ा तो सिनेमा हाल में सीटियां बजीं और तालियों की बौछार हुई। ‘लगान’ और सनी देओल ‘गदर’ का एक ही दिन रिलीज होना इस बात का भी सबूत है कि दर्शक एक साथ दो ऐसी फिल्मों को भी हिट करा सकते हैं, जिनमें देशप्रेम कूट कूट कर भरा हो। ‘गदर’ में इंटरवल के बाद सनी देओल पूरी तरह से हिन्दुस्तानी रंग में दिखाई देते हैं। जब वह पाकिस्तानी अवाम के बीच हिन्दुस्तान जिन्दाबाद था, हिन्दुस्तान जिन्दाबाद है और हिन्दुस्तान जिन्दाबाद रहेगा का नारा लगाते हैं तो दर्शक उछल पड़ते हैं। इस सीन पर ग्रामीण इलाकों के दर्शकों ने अपनी पगड़ियां उछालीं और मल्टीप्लेक्स दर्शक भी सीटियां बजाते दिखे। पर ‘स्वदेस’ के साथ ऐसा नहीं हुआ।  ‘लगान’ के बाद कंट्री फील को ध्यान में रखते हुए मौजूदा फ्लेवर के साथ आशुतोष गोवारिकर ने ‘स्वदेस’ में नासा की नौकरी छोड़ देने वाले शाहरुख खान को दिखाया। उसके और गांव वालों के साङो प्रयास से गांव में बिजली आ जाती है, पर फिल्म पिट जाती है। ‘स्वदेस’ में ‘लगान’ और ‘गदर’ जैसे गीत और डायलॉग नहीं थे, पर दर्शक उस मकसद की कद्र भी करना भूल गये, जिसे किसी सूट-बूट वाले एनआरआई ने देखा होगा। देश प्रेम को ही सवरेपरि मानते हुए विदु विनोद चोपड़ा ने ‘1942 ए लव स्टोरी’ बनाई और फरहान अख्तर ने ‘लक्ष्य’, जिसमें मस्तमौला करण शेरगिल (रितिक रोशन) बेमकसद फौज में भर्ती हो जाता है, पर देश की सीमा पर आकर उसे अपना मकसद मिलता है। ‘ए वेडनस डे’, ‘मुंबई मेरी जान’ और ‘आमिर’ भी कुछ हटके कही जाने वाली फिल्में हैं, जिनमें देश प्रेम की झलक मिलती है।

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