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बुरा मानो या भला: अलग है यह संसद

अपने टीवी पर संसद की कार्यवाही देखने वालों ने कुछ अलग महसूस किया होगा। यह संसद पिछले वक्त से कितनी फर्क दिखती है। स्पीकर तक दौड़ कर पहुंचना, जोर-जोर से नारे लगाना और चीख चिल्लाहट से सदन को स्थगित करा देना अब काफी कम हो गया है। हम मानने लगे थे कि यह हमारे लिए नहीं है। बेहतर है कि हम राष्ट्रपति प्रणाली पर चले जाएं। या फिर कोई और लोकतंत्र का जरिया ढूंढ लें। अब लोकसभा और राज्यसभा जिस कायदे से चल रही है, उससे एक उम्मीद जागती है। इसका सेहरा विपक्ष के सिर बांधा जाना चाहिए। आखिर हंगामा विपक्ष ही खड़ा करता है। मुझे तो एक ही चीज से चिढ़ है। वह है सदन से वॉक आउट कर जाना। यह बच्चों जैसा लगता है। अक्सर बच्चे खेलते-खेलते जब लड़ने लगते हैं, तो मुंह बनाकर कुट्टी कर जाते हैं। सदन तो गंभीर बातचीत के लिए होते हैं। आप सदन ही नहीं चलने देंगे, तो उसका क्या मतलब रह जाता है?

एक बात और मैं कहना चाहूंगा। उसे और लोगों ने भी महसूस किया होगा। हमारे सांसद या विधायक अपनी बात स्पीकर से नहीं करते। न ही वे सरकार से कुछ कह रहे होते हैं। वे अक्सर प्रेस गैलरी में मीडिया को ध्यान में रखकर अपनी बात कहते हैं। वे कुछ ऐसी तीखी बातें कहना चाहते हैं, जिससे अगले दिन अखबारों की सुर्खियां बन सकें। दिन भर उनका चेहरा टीवी पर दिखता रहे। हाल ही में हमने संसदीय लोकतंत्र का गंदा चेहरा जम्मू-कश्मीर विधानसभा में देखा। गमगीन सी और कभी न मुस्कुराने वाली महबूबा मुफ्ती ने स्पीकर का माइक ही छीन लिया था। और खुद स्पीकर भी गालियों पर उतर आए थे। बेचारे मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला तकरीबन रो ही पड़े थे। उन पर ऐसे आरोप लगे थे, जो सच नहीं थे। काश! जम्मू कश्मीर के विधायक अपनी लोकसभा से कुछ सीखें।
 
लीला नायडू
मैं उसे तब से जानता था, जब वह 12 साल की थी। यह पेरिस की बात है। उनके पिता डॉ. नायडू यूनेस्को में मेरे साथी थे। वह कभी-कभार पिता के साथ कैफेटेरिया में लंच पर चली आती थी। कभी-कभी उसकी फ्रांसीसी मां भी आ जाती थीं। हिंदुस्तानी पिता और फ्रांसीसी मां की मिलीजुली खूबसूरती उसे मिली थी। वह सचमुच खूबसूरत बच्ची थी। मुझे कोई शक नहीं था कि कुछ सालों में ही वह बेहद खूबसूरत लड़की बन जाएगी। वह फिल्मी दुनिया में जाएगी या किसी रईसजदे की हो जाएगी।
नायडू परिवार हिंदुस्तान लौटा और दिल्ली में बस गया। लीला एक बार घर पर आई थी। उसने सिख पर कुछ किताबें मांगी थीं। मैंने उससे पूछा था कि अचानक सिखों में दिलचस्पी की वजह क्या है? उसने बताया था कि वह एक मोने सरदार से शादी करने जा रही है। ओबरॉय होटल के मालिक मोहन सिंह ओबरॉय के बेटे विक्की से उसने शादी कर ली। यह शादी इंपीरियल होटल में हुई थी। पूरे सिख विधि-विधान यानी आनंद कारज के मुताबिक। तब इंपीरियल होटल भी ओबरॉय परिवार का ही था।
विक्की ओबरॉय और लीला के दो बेटियां हुईं। लेकिन यह शादी चली नहीं। विक्की जबरदस्त पियक्कड़ थे। कहते हैं कि जनपथ की एक स्ट्रीट लाइट से उखड़ गए। उसकी रोशनी बेडरूम में पड़ रही थी। उन्होंने अपनी रिवाल्वर निकाली और लाइट बुझ दी। जैसे-तैसे पुलिस से मामला रफा-दफा करना पड़ा। एक दोपहर लीला का हड़बड़ाते हुए फोन आया। मुझे जल्द बुला रही थी। मैं बीवी के साथ पहुंचा। कमरे का बुरा हाल था। दोनों चुपचाप बैठे थे। लेकिन एक-दूसरे को घूर रहे थे। हम एक घंटे उन्हें समझते रहे। लेकिन..।
लीला ने विक्की को छोड़ दिया। वह बॉलीवुड में अपनी किस्मत आजमाने बॉम्बे चली गई। उसकी खूबसूरती ने कई फिल्में दिलाईं। ‘अनुराधा’ उसकी पहली फिल्म थी। बाद में ‘द हाउस होल्डर।’ और भी फिल्में उसने कीं। लेकिन मैंने कोई नहीं देखी। वहीं कभी उसे अपने बचपन के दोस्त डॉम मोरेस मिले। वह इंदिरा गांधी की जीवनी लिख रहे थे। एक बार मैंने इंदिरा जी से पूछा कि आप कैसे डॉम से बात कर पाती हो! वह तो शब्दों को बुदबुदाता ही रहता है। उन्होंने कहा था कि लीला मुझे समझा देती है। वह किताब ‘मिसेज जी’ छपी। डॉम जब उन्हें किताब देने गए तो इंदिरा जी ने उनकी तारीफ करने के बजाय डांट-फटकार कर भगा दिया था।
डॉम किसी और के हो गए थे। लीला बुरी तरह डिप्रेशन में आ गई थी। खासा पीने लगी थी। वह फिर कभी उबर नहीं सकी। कहते हैं भगवान एक हाथ से देता है, दूसरे से ले लेता है। उसने लीला को खूबसूरती दी थी, लेकिन उससे खुशी छीन ली।

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