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स्व का तंत्र

आज हमारा स्वतंत्रता दिवस है। 62 साल पहले हमें अंगरेजी राज से आजादी मिली थी। आजादी की बात आती है तो तीन शब्द जेहन में घूमने लगते हैं- स्वतंत्र, स्वाधीन और स्वार्थ। काश! अपना तंत्र हो। हम किसी दूसरे के नहीं, अपने आधीन हों। तीसरा, हम स्व अर्थ में जीयें। स्वार्थ, कितना ही गलत इस्तेमाल होता हो, लेकिन है वह कमाल का शब्द। स्व अर्थो में जीना कितना मुश्किल या आसान है। यह स्व में जीने वाला ही महसूस कर सकता है। स्व अर्थो में जीने का मतलब रूढ़ि में स्वार्थी होना नहीं है। जब आप अपने में जीते हैं तो किसी दूसरे के नुकसान का कोई मतलब ही नहीं होता। दिक्कत स्व अर्थ में जीने से नहीं होती। दिक्कत होती है, दूसरों की जिंदगी में टांग अड़ाने से।
अपने यहां दो शब्दों पर बहुत जोर है। एक आत्मा और दूसरा मुक्ति। दोनों ही आत्म से जुड़े हुए हैं। अपने आत्म को खोजे बिना मुक्ति मुमकिन नहीं है। असल में आत्म को खोजने का मतलब है, अपने भीतर की ओर मुड़ना। अपने को जानना-समझना। अपनी प्रकृति को समझना। अपनी प्रकृति की ओर लौटना। और उसे समझे-जाने बिना मुक्ति नहीं है। कम से कम बाहर से मुक्ति तो नहीं है। एक देश या समाज की मुक्ति का मतलब है, अपने भीतर की शक्तियों को पहचानना, उन्हें संगठित करना। और जो भी बाहरी दबाव हैं, उनको अपने ऊपर हावी न होने देना। अपनी भीतरी शक्तियों को एकजुट किए बगैर किसी समाज को मुक्ति नहीं मिल सकती। भीतरी शक्तियां जब बिखरी होती हैं, तभी तो गुलामी आती है न। इसी तरह कोई मनुष्य जब तक भीतर की अपनी शक्तियों को नहीं जगाता है, तब तक वह जग नहीं सकता। और जगे बिना मुक्ति नहीं मिल सकती।
जब अपना भीतर मजबूत होता है, तभी तो स्वाधीनता आती है। यही भीतर तो हमारी प्रकृति है। अपनी प्रकृति को समझे बगैर कोई आजाद नहीं हो सकता। न देश, न समाज, न व्यक्ति। हर देश, समाज या व्यक्ति की एक प्रकृति होती है। उसे पहचाने बगैर हम स्व के आधीन कैसे हो सकते हैं? हमारा स्व तंत्र कैसे हो सकता है? हम स्व अर्थ में कैसे जी सकते हैं?

 

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