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कोई तो रुके

सरकार कह रही है कि स्वाइन फ्लू अभी और बढ़ेगा। सो बड़ी-बड़ी कंपनियां इसका टीका बनाने के लिए बढ़कर आगे आ रही हैं। सबको लग रहा है धंधे का यही टाइम है, कहीं हाथ से निकल न जाए मौका। प्राइवेट अस्पतालवालों को भी सरकार ने उम्मीद बंधा दी है-देंगे, तुम्हें भी मौका देंगे। खूब धंधा करना और फंदा कसना। सो उन्होंने भी अपनी छुरियां तेज करनी शुरू कर दी हैं। कंपनियों को यूं आगे आता देखकर बाबा रामदेव भी कूद कर आगे आ गए। योग शिविर तो बाद में कभी भी लगा लेंगे। वह तो सर्वकालिक विद्या है। अभी तो स्वाइन फ्लू की दवा बेच लें। वरना टाइम निकल जाएगा। सो तुलसी और गिलोय दिखाकर वे बोले-हमारे पास है इसका इलाज। वैसे सरकार कह रही है कि डरने की कोई बात नहीं। पर क्या करें जी, डरना पड़ रहा है।

पहले लग रहा था विदेशी बीमारी है। विदेश से आनेवालों को ही होती है। यह बस अड्डों की नहीं, हवाई अड्डों की बीमारी है। पर इसका तो दिनों-दिन स्वदेशीकरण होता जा रहा है। यह तो हवाई अड्डों से बाहर निकलकर बस अड्डों की बीमारी बनती जा रही है। यह तो स्कूलों में भी पहुंच गयी। हालांकि, अभी पब्लिक स्कूलों तक ही है। सरकारी स्कूलों के बच्चे कहीं इसे भेदभाव न मान लें-यह हमारे यहां क्यों नहीं। होती तो पढ़ाई से छुट्टी मिल जाती। खैर, सरकार ने भरोसा दिला दिया है कि यह बीमारी और बढ़ेगी। सरकार कह रही है, अभी महंगाई और बढ़ेगी। कहते हैं तब अरहर सवा सौ रूपए किलो बिकेगी। वैसे सोने-चांदी की तरह अरहर दाल की डकैतियां अभी से शुरू हो गयी हैं। खबर आयी है कि बुंदेलखंड में किसी ने पच्चीस किलो अरहर की दाल की डकैती डाली। कृषि मंत्री शरद पवार को इसका बड़ा अफसोस रहा होगा कि चीनी पैदा करनेवाले जिस इलाके से वे आते हैं, वहां वे क्या मुंह लेकर जाएंगे। क्या जवाब देंगे, अपने लोगों को कि जब दाल के भाव बढ़ रहे थे, जब सब्जियां तक नहीं मिल रहीं थी, जब आटा लंबी छलांगें लगा रहा था, जब चीनी एक ही जगह खड़ी रही। क्यों? सो उन्होंने एक बयान दिया और चीनी ने एक ही दिन में तीन रुपए की लंबी छलांग लगा दी। सब बढ़ने ही वाला है-स्वाइन फ्लू भी, महंगाई भी, सूखे की मुश्किल भी और अपराध भी। हां, आदमी की जान की कीमत जरूर घट रही है। कौड़ियों के मोल है।

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