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एशिया के खुलते द्वार

आर्थिक समझदारी का परिचय देते हुए भारत ने अपने व्यापार के पूर्वी द्वार को खोलकर नई संभावनाओं को जन्म दिया है। विश्व व्यापार संगठन की दोहा वार्ताओं का दौर अटका हुआ है और जो ज्यादा आशावादी हैं, वे भी उसके 2010 से पहले पूरा होने की उम्मीद नहीं जता रहे हैं। ऐसे में मंदी के दौर से निकलने और व्यापारिक गतिविधियां बढ़ाने को उत्सुक देशों के पास क्षेत्रीय व्यापारिक समझोते करना एक ठोस उपाय की तरह है। अमेरिका और यूरोप के देश ऐसा कर रहे हैं और अगर भारत ने आसियान देशों के साथ व्यापक व्यापारिक समझोता किया है तो यह उसी ढर्रे पर उठाया गया एक कदम और पश्चिम की क्षेत्रीयता की तुलना में पूरब की क्षेत्रीयता कायम करने का एक प्रयास भी है। यह पश्चिममुखी भारत की पूरबमुखी नीति का मुखड़ा है। जाहिर है नब्बे के दशक में आर्थिक संकट का झटका झेल चुके आसियान देश अब संभल चुके हैं और उनके साथ करीब 4,000 उत्पादों को आयात शुल्क मुक्त करने का समझोता किसी भी तरह से घाटे का नहीं रहने वाला है। लेकिन शून्य आयात शुल्क प्राप्त करने का यह लक्ष्य तत्काल नहीं रखा गया है। चार महीने बाद शुरू होने वाले इस समझोते में उद्योग और व्यापार जगत को तैयारी के लिए 2013 से 2016 तक का समय दिया गया है।

पिछले छह साल की सघन बातचीत से हासिल इस समझोते से आसियान देशों और भारत के बीच का व्यापार 40 से 60 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीन, रसायन और कपड़ों के जिन उत्पादों के आयात शुल्क घटाने पर यह समझोता केंद्रित है, वे व्यापार के 80 फीसद हिस्से हैं। इसीलिए भारत को आसियान देशों का इतना बड़ा बाजार मिलने पर सीआईआई और फिक्की प्रसन्न हैं और आर्थिक सुधारों के बचे काम करने का आह्वान कर रहे हैं। उन बचे कामों में भारत और आसियान देशों के बीच सेवा और निवेश के क्षेत्र में उदारीकरण करने के लिए वार्ताएं और समझोतों की अपेक्षाएं हैं। लेकिन व्यापारिक वर्ग को खुश करने वाले इस समझोते से काली चाय, काली मिर्च, कॉफी और रबड़ पैदा करने वाले केरल के किसानों की आशंकाएं इतनी गहरी हैं कि इस पर सत्तारूढ़ माकपा और विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने भी एक हो कर अपनी ¨चताएं प्रकट की हैं। इसी डर के चलते भारत ने कुछ की संवेदनशील और 489 वस्तुओं की नकारात्मक सूची बनाकर संतुलन कायम किया है।

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