DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

टूटता परिवार

यह माना जाता है कि भारतीय जनता पार्टी पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नियंत्रण चलता है इसलिए भाजपा में कई दिनों से जो अहसमति और विद्रोह के स्वर सुनाई दे रहे हैं वे आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व को पसंद नहीं आ रहे होंगे। वैसे पूरी-पूरी संभावना यही है कि इस सत्ता संघर्ष में आरएसएस की ही चले क्योंकि अब भी भाजपा संघ की छाया से बाहर निकलने का सोच नहीं सकती, लेकिन इसे पार्टी को काफी नुकसान होगा। ताजा बगावत वसुंधरा राजे सिंधिया और उनके समर्थकों ने की, जो वसुंधरा राजे को विधानसभा में विपक्ष के नेता पद से हटाने के विरोध में हैं। वसुंधरा राजे से जिसकी जो भी असहमति हो लेकिन सामान्य नियम तो यही है कि अगर पार्टी के 78 में से 57 विधायक किसी के पक्ष में खुलकर आ सकते हैं तो नेता उसे ही होना चाहिए। लेकिन संघ की वसुंधरा राजे से काफी वक्त से नहीं बन रही है और पार्टी में संघ द्वारा समर्थित नेता वसुंधरा राजे को हटाने पर तुले हैं। लालकृष्ण आडवाणी ने वसुंधरा समर्थक विधायकों से मिलने से मना कर दिया। इसकी एक वजह तो यह हो सकती है कि आडवाणी पार्टी में खुला विद्रोह नहीं देखना चाहते, दूसरी वजह यह हो सकती है कि फिलहाल आडवाणी संघ से समझोता करके अपना पद बचाना चाहते हैं या अपने खास समर्थकों के लिए बेहतर डील चाहते हैं।

जाहिर है संघ का असली निशाना आडवाणी ही हैं जिन्हें हटा कर संघ पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है। लोकसभा चुनावों में हार से आडवाणी की स्थिति काफी कमजोर हो गई है और इसका फायदा संघ उठाना चाहता है। फिलहाल तो इस लड़ाई में संघ जीतता हुआ दिख रहा है क्योंकि आडवाणी अटल बिहारी वाजपेयी की तरह लोकप्रिय नेता नहीं हैं और अपने और अपने समर्थकों के लिए जितना अड़ने का साहस वाजपेयी में था उतना आडवाणी में नहीं है। संघ भाजपा को फिर पुराने भारतीय जनसंघ की स्थिति में ले जाना चाहता है लेकिन इसका एक परिणाम यह भी होगा कि भाजपा की राजनैतिक ताकत भी भारतीय जनसंघ जितनी रह जाएगी। समस्या यह है भाजपा की संघ के प्रति जवाबदेही है लेकिन संघ की भाजपा के प्रति कुछ जवाबदेही नहीं है। संघ से बंधकर भाजपा कभी कांग्रेस का विकल्प नहीं बन सकती यह पार्टी नेताओं को समझना होगा।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:टूटता परिवार