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नपेंगे पथ निर्माण के अधिकारी!

वन संरक्षण अधिनियम के उल्लंघन के मामलों में प्रदेश के अधिकारियों पर गाज गिरने की संभावना बढ़ गई है। केन्द्र सरकार के अल्टीमेटम के बावजूद राज्य सरकार ने फॉरेस्ट क्लियरेंस मामले से जुड़े सड़कों की सूची उसे उपलब्ध नहीं करायी। न ही सड़क निर्माण के दोषी अधिकारियों की सूची ही भेजी। प्रदेश के पर्यावरण एवं वन विभाग के अधिकारियों की माने तो किसी भी समय केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से नोटिस आ सकती है। ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट भी काफी सख्त है।

जून में केन्द्रीय वन मंत्रालय के अधिकारी सीसीएफ (सेन्ट्रल) जेके तिवारी ने प्रदेश की दो सड़कों शीतलपुर-परसा-सोनहो और हाजीपुर-वासुदेवपुर का निरीक्षण कर पाया था कि दोनों ही सड़कों का निर्माण बिना फॉरेस्ट क्लियरेंस के किया जा रहा है। छानबीन में यह भी उजागर हुआ था कि बिना फॉरेस्ट क्लियरेंस के करीब 40 सड़कों का या तो निर्माण हो गया है, हो रहा है या निर्माण की तैयारी है।

इसके बाद ही उन्होंने प्रदेश के मुख्य सचिव से सूबे में बन रही ऐसी सभी सड़कों की और दोषी अधिकारी की सूची मांगी जिनके किनारे की जमीन ‘सुरक्षित वन क्षेत्र’ घोषित हैं। 15 जुलाई तक वह सूची वन मंत्रालय को मिल जानी थी। पर अब तक सूची यहां से केन्द्र को भेजी ही नहीं गई है। पर्यावरण एवं वन विभाग के नोडल पदाधिकारी मुरारीजी मिश्र ने पूछने पर कहा कि वे 22 जुलाई को ही इस संबंध में पथ निर्माण विभाग के प्रधान सचिव को जानकारी दे चुके है। 

एक्ट के मुताबिक केन्द्र सरकार की स्वीकृति के बिना राज्य सरकार ऐसी भूमि का कोई दूसरा उपयोग नहीं कर सकती। उल्लंघन करने पर 15 दिन से लेकर एक महीने की सजा तय है। राज्य सरकार ने सूबे की अधिकांश मुख्य सड़कों के किनारे की भूमि को ‘सुरक्षित वन’ क्षेत्र घोषित कर रखा है।

ऐसे में सड़कों के चौड़ीकरण की खातिर इस भूमि के उपयोग के लिए केन्द्र सरकार से ‘फॉरेस्ट क्लियरेंस’ अनिवार्य है। पर पथ निर्माण विभाग की शिथिलता के कारण मामला अब फंस गया है।

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