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गांधी टोपी ने गांव में ला दी समानता

गांधी टोपी ने गांव में ला दी समानता

महात्मा गांधी आजादी की लड़ाई के ऐसे नायक थे, जिन्होंने छूआछूत और ऊंच-नीच को खत्म करने की मुहिम छेड़ी थी। महात्मा गांधी भले ही मध्य प्रदेश के हरदा जिले के गोमगांव न आए हों मगर उनका संदेश इस गांव तक पहुंचा है और सही अर्थों में यह गांव उनकी इस मुहिम का सच्चा साथी भी बना है। जहां सारे भेदभाव मिटाने में गांधी टोपी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

रियासत काल में गोमगांव मकड़ई रियासत का हिस्सा हुआ करता था। अन्य गांवों की तरह यहां भी छुआछूत और ऊंच नीच की जड़ें काफी गहरी थी। आजादी के 35 साल बाद भी यहां शिक्षा की किरण नहीं पहुंच पाई थी। फरवरी 1983 में यहां स्कूली शिक्षा का आगाज हुआ।

इस स्कूल में 14 साल सेवाएं देने वाले शिक्षक गोविंद प्रसाद अहिरवार ने बताया कि उन्होंने 1984 में जब स्कूल में कार्यभार संभाला था तो उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि समाज में व्याप्त ऊंच-नीच का भेदभाव छात्रों के बीच सामंजस्य बैठाने में बाधक बन रहा है। तब उनके दिमाग में आया कि एक नई व्यवस्था के शुरू करने से समानता का भाव लाया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने गांधी टोपी को उपयुक्त पाया और उसे सभी छात्रों के लिए अनिवार्य कर दिया।

1984 में कक्षा तीसरी तक रही इस प्राथमिक पाठशाला में अब आठवीं तक की पढ़ाई हो रही है और वर्तमान में 300 छात्र पढ़ रहे हैं। इस शाला की गणवेश खाकी पेंट सफेद शर्ट और खादी की गांधी टोपी है। यहां के छात्र नियमित रूप से रघुपति राघव राजा राम की वंदना भी करते हैं।
 
अहिरवार बताते हैं कि जनजाति और पिछड़ी जातियों के बाहुल्य वाले इस गांव की शाला में गांधी टोपी ने सामाजिक समरसता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यही कारण है कि आज इस गांव में कोई भेदभाव नहीं है।

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