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बदलने होंगे विदेश नीति के सारे औजार

कौटिल्य युग से अब तक यथार्थवाद विदेश नीति का मूलभूत सिद्धांत रहा है। जबकि भारतीय विदेश नीति अपने आरंभ से ही आदर्शवाद से घिरी रही है। भारतीय विदेश नीति की चुनौती यह है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों को लेकर दृढ़ता दिखाए। यह दृढ़ता घोषित की जाने वाली विदेश नीति में दिखाई पड़नी चाहिए, विशेषकर उनके संदर्भ में जो हमारे राष्ट्रीय हितों का अतिक्रमण कर रहे हों। यही आवश्यकता विदेश नीति के सूत्रों को संस्थागत रूप देने की मांग करती है। अगर इतिहास की रोशनी में आज की भारतीय विदेश नीति के संस्थानों की व्याख्या की जाए तो यह एक त्रासदी ही लगेगी। विन्सटन चर्चिल के शब्दों में द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व जिन्होंने बदलते रणनीतिक यथार्थ की उपेक्षा की,‘‘ वे विचित्र विरोधाभास में फंसे थे। वे अनिर्णय में रहने का निर्णय लेते हैं, संकल्पहीन होने का संकल्प लेते हैं, ढुलमुल होने के लिए अड़ियल बनते हैं, पिघल जाने के लिए ठोस बनते हैं और नपुंसक होने के लिए सर्वशक्तिमान बनते हैं। ’’ भारत को किसी भी वक्त से ज्यादा आज जरूरत इस बात की है कि वह अतीत के दकियानूसी विचारों से मुक्त होकर दुनिया में अपनी भूमिका की समीक्षा करे। हेनरी किसिंजर ने इतिहास के सिलसिले में अंतरराष्ट्रीय राजनय की व्याख्या करते हुए लिखा है-‘‘ राजनय इतिहास की गति का अनुमान लगाते हुए घटनाओं से आगे रहने का संघर्ष है। ’’ लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज हम संस्थाओं, नीति निर्माण प्रक्रिया की संरचनाएं, बौद्धिकों और शोध संस्थानों के रूप में इस तरह से संगठित नहीं हैं कि घटनाओं से आगे रह सकें और इतिहास को देख सकें।

हमारी विदेश नीति के संस्थानों में जो बदलाव हो सकते हैं, वे इस प्रकार हैं। सर्वप्रथम हम जानते हैं कि विदेश मंत्रालय कई मायनों में अन्य मंत्रालयों से अलग है। ऐसा इसलिए, क्योंकि इसे तीन समांतर काम करने होते हैं। इसे देश की विदेश नीति बनाने के साथ उसे व्यवहार में लागू करने और लागू करने के असर और सुझाव भी प्रदान करने होते हैं। इसके साथ ही मंत्रालय को अपने मानव संसाधन की नियुक्तियों और प्रबंधन संभालने व विदेशों में स्थित 10 दूतावासों और महावाणिज्य दूतावासों की भी देखभाल करनी होती है। काम करने का मानक बनाना, कार्यकुशलता की जरूरत तय करना और मानव संसाधनों की निगरानी भी मंत्रालय के कामों में आता है। इस लिहाज से केंद्र सरकार का कोई और मंत्रालय इसका सानी नहीं है। इस मंत्रालय में मानव संसाधन के प्रबंधन का अंतरराष्ट्रीय मानक अपनाना होता है। दूसरी बात यह है कि भारत में विदेश नीति के लिए बने शोध संगठन और उनसे जुड़ी अन्य इकाइयां अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरी नहीं उतरतीं। इसलिए हम किस प्रकार विश्व के श्रेष्ठ बौद्धिकों (थिंक टैंक) के साथ मिल कर मरणासन्न, अक्षम और संसाधन विहीन मौजूदा संस्थानों को पुनर्जीवित करें और नई इकाइयां कैसे बनाएं, इस बारे में एक संपूर्ण नजरिए से सोचना चाहिए।

तीसरी बात यह है कि विदेश मंत्रालय के संसाधन जरूरत से बेहद कम हैं। डेनियल मार्के के अध्ययन के अनुसार जितनी जरूरत है, उसकी तुलना में भारत में उपलब्ध संसाधन काफी कम हैं। भारत के विदेश मंत्रालय के पास उपलब्ध 56.3 करोड़ डॉलर का संसाधन चीन का लगभग आधा है और ब्रिटेन, जर्मनी जपान से काफी नीचे है। जबकि अमेरिकी विदेश मंत्रालय का संसाधन इसका बीस गुना है। भारत के पास महज 669 राजनयिक हैं, जबकि मझोले आकार के जर्मनी और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों में यह संख्या पांच गुना और अमेरिका में 30 गुना है। हमारे यहां मुख्यालय पर किसी देश से संबंधित जितने लोग काम करते हैं और उस देश के मिशन में जितने तैनात हैं, उनका अनुपात 1: 4 का है जो कि नितांत अव्यवहारिक है। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय अनुपात 1:1.5 का है । ऐसे में हमें कम से कम मौजूदा क्षमता को दोगुना कर इस अनुपात को 1:2 तक लाना चाहिए। विदेश मंत्रालय के बजट पर दोबारा निगाह डालने की जरूरत है। विदेश मंत्रालय का खर्च राष्ट्रीय बजट का 0.75% है, जहां कनाडा में यह 2.15% है। यहां तक कि न्यूजीलैंड का 1.3% और सिंगापुर का 1% भी भारत से ज्यादा ही है। इसलिए हमें सबसे पहले बजट और फिर मुख्यालय और मिशन के अनुपात को ठीक करना चाहिए। चौथी बात यह है कि हमारे पास नई जायदाद खरीदने की भी योजना होनी चाहिए। उन संपत्तियों के रखरखाव पर आने वाले खर्च के बारे में ज्यादा यथार्थवादी आवंटन करना चाहिए और अगर हमें अन्य देशों के मुकाबले अपने राजनयों की पहुंच बढ़ानी है तो उनके मनोरंजन भत्ते का व्यवहारिक तरीके से निर्धारण होना चाहिए।

पांचवीं बात यह है कि हमारी केंद्रीय निर्णय प्रक्रिया में विदेश मंत्रालय की भूमिका को ज्यादा प्रासंगिक बनाना चाहिए। चूंकि वश्विक स्तर पर पारस्परिक निर्भरता बढ़ रही है, इसलिए आर्थिक, वाणिज्य और पेट्रोलियम नीतियों के निर्धारण में भी विदेश मंत्रालय की भूमिका होनी चाहिए। दूसरे मंत्रालयों के काम में अतिक्रमण किए बिना इस काम को कैसे किया जाए, इसके लिए मंत्रालयों के भीतर तालमेल होना जरूरी है। होना यह चाहिए कि एक विशेष कार्य बल इस बारे में गहराई से विचार करे और अपनी सिफारिशें दे।

छठी बात यह है कि भारत जिस प्रकार एक महत्वपूर्ण आर्थिक शक्ति बना है, उस लिहाज से व्यापार, वाणिज्य और निवेश की आवश्यकताओं की विधिवत देखभाल नहीं हो रही है। यह सब ऐसे काम हैं, जिन्हें करने में मौजूदा विदेश मंत्रालय सक्षम नहीं है। इसलिए आज नौकरशाही के स्थापित ढांचे से अलग अन्य माध्यमों से तमाम तरह की प्रतिभाओं को शामिल करने की जरूरत है। कई बार आर्थिक और विदेश नीति के हित इतने मिल जाते हैं कि विदेश नीति के निर्माण में एक सहजीविता की जरूरत पड़ती है। लेकिन व्यापार, वाणिज्य, निवेश और पर्यटन के लिए हमें विशेषज्ञ चाहिए ही। संक्षेप में मेरा कहना यह है कि भारतीय विदेश नीति की जटिल चुनौतियों का सामना करने में विदेश मंत्रालय का मौजूदा ढांचा सक्षम नहीं है। इसमें ढांचागत सुधार की सख्त जरूरत है। यहां लार्ड पॉमरसटन का 1784 में दिया गया वह वक्तव्य उल्लेखनीय होगा जिसमें उन्होंने कहा था,‘‘ हमारे न तो कोई सतत मित्र हैं न ही कोई स्थायी शत्रु। हमारा हित ही सतत और स्थायी है और हमारा कर्तव्य इन्हीं हितों को साधते रहना है।’’ हमें संदेह है कि हमारा राजनय, उसे चलाने वाले संस्थान, निर्णय लेने की प्रक्रिया और दूसरे को निर्णय लेने का अधिकार देने की प्रक्रिया यह सब इस समय ऐसी स्थिति में हैं कि वे हमारे हितों को सतत रूप से साध सकें।

nandu@nksingh.com
लेखक राज्यसभा सदस्य और जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे केन्द्र सरकार में सचिव रह चुके हैं

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