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कर्नाटक : उपचुनाव की उलझी राजनीति

दिसंबर 2008 में जब कर्नाटक में विधानसभा उपचुनाव हुए थे तो येदयुरप्पा सरकार अल्पमत में थी और इसे जीतना उसके अस्तित्व के लिए जरूरी था। लेकिन इस बार जब विधानसभा की पांच सीटों के लिए उपचुनाव हो रहे हैं तो भाजपा की सरकार के पास बहुमत है और हार-जीत से कोई तूफान नहीं आने वाला। पिछली बार भाजपा ने राज्य में ऑपरेशन कमल चलाया था और इसके बल पर कांग्रेस और जनता दल (एस) के प्रभावशाली विधायकों को अपने पाले में शामिल कर लिया था। वे सभी विधायक जो दल बदल करके भाजपा में आए थे, उनसे इस ऑपरेशन के तहत इस्तीफा दिलवा कर उन्हें चुनाव में फिर से जितवा दिया गया था। एक बार जब बहुमत मिल गया तो भाजपा को ऐसे किसी ऑपरेशन की जरूरत नहीं थी, लेकिन फिर भी उसने मंद गति से इस ऑपरेशन का दूसरा चरण चला दिया, इसी वजह से भाजपा के लिए ये उपचुनाव महत्वपूर्ण हो गए हैं।

जिन पांच जगहों पर चुनाव होने हैं, उनमें से चार पर कांग्रेस का कब्जा था- चित्तपुरा, गोविंदराजनगर, चन्नापटना और कोल्लेगाला। रामानगर से पिछली बार जनता दल (एस) को जीत मिली थी। चेन्नापटना और गोविंदराजनगर में चुनाव इसलिए करवाना पड़ा क्योंकि कांग्रेस के विधायक सीपी योगेश्वर और सोमन्ना, दल बदलकर भाजपा में जा मिले थे।

चित्तपुरा और कोल्लेगाला में एम. मल्लिकाजरुन खड़गे और ध्रुव नारायण को लोकसभा चुनाव में जीत के कारण इस्तीफा देना पड़ा। पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के लोकसभा में चुन लिए जाने के कारण ही रामानगर की सीट खाली हुई।

इनमें से ज्यादातर सीटें कांग्रेस की थीं, इसलिए उस इन्हें बनाए रखने का दबाव है। पार्टी तो पांचों सीट पर जीत का दावा कर रही है। कांग्रेस की प्राथमिकता सूची में इन सीटों का महत्व खासा बढ़ गया है, यही वजह है कि राज्य से पार्टी के जो छह सांसद जीते उनमें से चार को मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में जगह मिल गई।

ये चारों ही मंत्री- एस एम कृष्णा, वीरप्पा मोइली, मल्लिकाजरुन खड़गे और के एच मुनियप्पा चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं। पार्टी ने अपना चुनाव अभियान नेशनल कॉलेज ग्राउंड से शुरू किया। अभी चंद रोज पहले ही इसी मैदान पर भाजपा की येदयुरप्पा सरकार ने अपना एक साल पूरा करने के मौके पर ‘विजय संकल्प रैली’ की थी।

लेकिन कांग्रेस ने जो उम्मीदवार चुने हैं वे तो यही बताते हैं कि पार्टी अभी भी बेटों के सहारे ही अपनी नैया खेना चाहती है। पांच उम्मीदवारों में से तीन पार्टी के बड़े नेताओं के बेटे हैं। तीनों पहली बार चुनाव मैदान में उतरे हैं।

जनता दल (एस) रामानगर और चेन्नापटना में काफी मजबूत है, वह रामानगर सीट को अपने पास बनाए रखते हुए चेन्नापटना को भी जीतने की कोशिश कर रही है।

इसके साथ ही उसका दावा है कि वह कोल्लेगाला को भी जीत लेगी। यह सीट कामराजनगर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के तहत आती है, जिस पर देवगौड़ा परिवार का अच्छा खासा प्रभाव है।

फिर इस बात की कोशिश भी चल रही है कि दोनों ही दल इस चुनाव को मिलकर लड़ें। अगर दोनों की ताकत मिल जती है तो भाजपा के लिए इनमें से किस भी सीट पर जीत पाना मुमकिन नहीं होगा।

लेकिन भाजपा के लिए फिलहाल राहत की बात यही है कि ये दोनों ही पार्टियां एक दूसरे के लिए जगह छोड़ने के मूड में नहीं हैं, यानी उनकी ताकत के मिलने की कोई संभावना नहीं है। लेकिन एक दो सीट पर अगर उन्होंने जमीनी स्तर की आपसी समझ बूझ बना ली और तालमेल हो गया तो नतीजे पर भारी असर पड़ सकता है। दोनों के बीच अनौपचारिक तालमेल की उम्मीद इसलिए भी है क्योंकि विधानसभा में दोनों ही पार्टियों ने अभी तक बहुत ही अच्छी समझ-बूझ का परिचय दिया है।

भाजपा के लिए महत्वपूर्ण है कि वह इन पांच में से कम से कम तीन सीट तो जीते ही। एक तो इससे ऑपरेशन कमल को जारी रखने के मुख्यमंत्री के प्रयास पर मुहर लग जाएगी। इससे वे अपने उन आलोचकों का मुंह भी बंद कर देंगे जो उन पर लिंगायत समुदाय को ज्यादा महत्व देने का आरोप लगाते रहे हैं।

कभी कांग्रेस के काफी वरिष्ठ और महत्वपूर्ण नेता रहे फिल्म अभिनेता सी पी योगेश्वर चेन्नापटना सीट को अपने पास बनाए रखने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं, वे इसी सीट से विधायक थे और इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए थे।

अगर पार्टी इनमें से ज्यादातर सीटों पर चुनाव हार जाती है तो येदयुरप्पा के लिए संकट खड़ा हो जाएगा। इससे उनके मुख्यमंत्री बने रहने पर भी प्रश्न-चिन्ह लग सकता है।

radhaviswanath73@yahoo.com
लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं

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