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23 फरवरी, 2020|4:52|IST

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परदेस में पिया

जब से साहित्य के केन्द्र में स्त्री और दलित विमर्श का अतिक्रमण हुआ है, तब से लेखकों की पत्नियां और मेहनत मजूरी वाले दलितों के कान खड़े हैं। पुराने जमाने में साहित्यकार अपनी स्थापना और प्रतिष्ठा के पीछे अपनी एकाधिक किन्तु ग्रामीण बीवियों के प्रसंग ओट में रखता था। मेरे कुछ मित्र भी साहित्यकार रहे हैं, जो अपनी प्रेमिकाओं को पत्नी न बना पाए किंतु अपनी प्रतिष्ठास्वरूप एकाधिक शादियों में व्यस्त रहे। आजकल सफल और चर्चित साहित्यकार वो है, जो कम से कम अस्सी पार का हो। जब से भारत में औसत आयु तीस से बढ़कर छप्पन-साठ वर्ष हो गई है, तब से युवावस्था को नई परिभाषा और नए नपने की जरूरत आन पड़ी है। मेरे एक आदरणीय और लगभग नब्बे की आयु में अर्धमूर्छित साहित्यकार कहते हैं कि बीवी शुरू-शुरू में रमणीय प्रेमिका, बच्चों के बाद लगभग सहचरी और साठ-सत्तर की उम्र के बाद नर्स लगने लगती है। सोढोत्तरी युग में कई कवि-कहानीकार गांव या कस्बे में अपनी घूंघटनुमा पत्नी को छोड़ कर आधुनिक ‘उज्जवनियों’ में चले गए। यानी दिल्ली, बम्बई, भोपाल आदि। वहां उन्हें यथार्थ, वास्तविकता, जादुई यथार्थ, यथास्थितिवाद, उत्तरआधुनिकता जैसे सांस्कृतिक संक्रमण से जूझना पड़ा। गांव की पाठशाला और जेएनयू का फर्क खुपरिया में त्रासदीनुमा संत्रास की तरह गनगनाने लगा। गांव से स्वयं निष्कासित, जो चिर-साहित्यकार केवल आम का अचार जानते थे, वे महानगरों में जाकर विचार में फंस गए। मौलिकता बनाए रखने के लिए वे अस्सी आयु पार के बड़े लेखक दिल्ली में रहते हुए धोती जरूर पहनते हैं, ताकि सनद रहे कि वो अब भी ग्राम परंपरा के हैं। उनका लेखक ‘वापसी’ पर केन्द्रित हो रहा होता है। याने कविता में प्रेम की वापसी, कहानी में किस्सागोई की वापसी, जो आसमान छेद कर सत्ता के दरबार तक फैल गए, उन वृक्षों की जड़ों की तरफ वापसी। फिराक साहब होते तो अपनी परमप्रिय गाली देकर कहते- ‘अरे..जादों, काहिलों, अब अगर वापसी-वापसी और लौटने की बेचैनी है तो तुम्हारी फलां-फलां। सालों बाहर गए ही क्यूं थे।’

अंत में मैं शीर्षक पर आना चाहूंगा। हमारे लोकगीतों में पिया के परदेस जाने की परम्परा है। जो परदेस न जाए वो भला कहां का पिया। बिहार के भिखारी ठाकुर ने इन्हीं विदेसिया चरित्रों को पकड़ा था। मगर समकालीन कालिदासों की क्या कहें। गांव में मल्लिका। दिल्ली में प्रियगुमंजरी। मेरा यह आलेख थोड़ा जटिल है, इसीलिए साहित्यिक है। साहित्य में ग्रामीण कृपया इसे न पढ़ें।

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  • Web Title:परदेस में पिया