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एक-चौथाई मुल्क पर सूखे का साया

भारत में इस साल एक जून से 8 अगस्त तक जो बारिश हुई है, वह औसत से करीब 28 प्रतिशत कम है। पिछले सात साल में इतनी कम बारिश पहले कभी नहीं हुई। इससे देश के कई राज्यों में सूखे की आशंका पैदा हो गई है। केंद्र और कई राज्य सरकारें इससे चिंतित हैं। केंद्र सरकार तो सूखे के चलते आसन्न खाद्यान्न संकट से निपटने के लिए आपात योजना तैयार करने में जुट गई है। चूंकि देश में खेती की केवल 40 प्रतिशत जमीन पर सिंचाई के इंतजाम हैं, इसलिए ज्यादा दारोमदार बारिश पर ही रहता है- और कम बारिश होने से हमेशा अर्थव्यवस्था पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। खासकर खरीफ की फसल तो मॉनसून पर ही निर्भर करती है।

वर्ष 2002-03 में, जब देश में औसत से 19 प्रतिशत कम बारिश हुई थी, तो खरीफ की फसल में भी 19.1 प्रतिशत गिरावट आई थी। इसी प्रकार 2004-05 में भी बारिश कम होने से खरीफ की फसल का उत्पादन केवल 102.9 मिलियन टन हुआ था, जो इससे पिछले साल के मुकाबले 9 मिलियन टन कम था।

अब, जब कि देश के तकरीबन दो सौ  जिले सूखाग्रस्त घोषित किए ज चुके हैं, साल 2002 के सूखे से इसकी तुलना करना लाजिमी हो गया है। इस बार पंजब और हरियाणा जसे राज्यों में भी सामान्य से 30-40 प्रतिशत कम बारिश हुई है, लेकिन यहां सिंचाई के सुविकसित साधनों के कारण फसल पर इसका असर कम ही होने की संभावना है।

(सभी आंकड़े भारत मौसम विभाग, कृषि मंत्रालय, रिजर्व बैंक, क्रिसिल, फूड कॉपरेरेशन और योजना आयोग के सौजन्य से)

केंद्र नरम रुख अपनाए- डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक, मुख्यमंत्री, उत्तराखंड

उत्तराखंड में कृषि व फलोत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। काश्तकार परेशानी में हैं। हमने प्रधानमंत्री व कृषि मंत्री से सूखा राहत की मांग की है। राज्य सरकार ने फरवरी महीने में ही 214 करोड़ की मांग की थी।

सूखे के अध्ययन के लिए केन्द्र की टीम भी आई, लेकिन चार महीने बीतने के बाद भी कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली। केन्द्र सरकार ने पहले चरण की धनराशि ही नहीं दी है। दूसरे चरण के लिए 200 करोड़ रुपए की और आवश्यकता पड़ेगी। नए राज्य के प्रति केन्द्र को नरम रुख रखना चाहिए। फिलहाल, हमने केन्द्रीय राहत कोष से जिलों को 32 करोड़ की धनराशि प्राप्त की है। लेकिन सीआरएफ से अभी राज्य को 106 करोड़ रुपए मिलने शेष हैं।

सूखे के संकट से निपटने के लिए कांग्रेस के पांचों सांसदों ने भी कोई ठोस पहल नहीं की है। उत्तराखंड के अधिकतर क्षेत्र वर्षा के पानी पर निर्भर हैं। सिंचाई के साधन तराई में ही उपलब्ध हैं।

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