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महाभारत के निर्देशक

महाभारत युद्घ खुद ही नहीं हो गया। श्रीकृष्ण ने स्वयं इसकी परिकल्पना की थी। ईश्वर के लिए जो केवल मानसकल्पना मात्र है, वही मनुष्य के लिए वास्तविक सत्य प्रतीत होता है। श्रीकृष्ण महाभारत के केन्द्रीय चरित्र थे। उन्होंने विभिन्न चरित्रों के माध्यम से अपनी कल्पना के अनुरूप अपना काम निकाल लिया। श्रीकृष्ण के रूप में मानवदेह में परमपुरुष थे, श्रीकृष्ण सृष्टि के प्राणकेन्द्र थे। श्रीकृष्ण ने अपने लिए भी एक भूमिका चुन ली थी। सारे विश्व के रूपकार परमपुरुष स्वयं महाभारत में एक विशेष परिकल्पना की, जिससे कि मनुष्य प्रगति की दिशा में अग्रसर हो सके। उन्होंने सामाजिक ग्लानि और दुर्बलता को दूर कर सामाजिक देह में शक्ति का संचार किया था। उन्होंनें अजरुन में शक्ति सम्पात के द्वारा उसके मानस द्वन्द्व को दूर किया। जब श्रीकृष्ण मातृगर्भ में थे, उस समय देवकी पहले की अपेक्षा काफी दुर्बल हो गई थी, पर देवकी और वासुदेव ने कंस के दवाब के सामने घुटने नहीं टेके। श्रीकृष्ण ने कारागृह के द्वाररक्षक और बृज में आकर नन्द-यशोदा में भी शक्ति और साहस भर दिया। उन्होनें दुर्योधन, सुदामा, गोपगण सबों को प्रभावित किया था। वृन्दावन के गोपगण कृष्ण को बहुत प्यार करते थे। वे कृष्ण के इतने अन्तरंग सखा थे कि उनकी महिमा जानते ही नहीं थे। वे बस इतना जानते थे कि कृष्ण कन्हैया उनका सबसे प्रिय, प्रियतम प्राणसखा है। वे उससे अलग नहीं रह सकते। श्रीकृष्ण के सामने अपनी योजनाए थीं। वे जानते थे कि वे लौट कर ब्रज नहीं आएंगे। उन्हें बड़े-बड़े काम करने हैं, इसलिए उन्होंने भावुक भक्तों को भावमयी भाषा में कहा था- मेरा शरीर ब्रज से दूर रह सकता है, पर मेरा मन सदा ब्रज की धूल में लौटता रहेगा। इसी भाव ने गोप-गोपियों को गदगद कर दिया। उनके शक्तिसंचार और आघात करने के पीछे एक ही उद्देश्य था- भारत को महाभारत बनाना।

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