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कर राहत के मायने

वित्तमंत्री ने अपना वादा निभाया। बजट पेश करते हुए उन्होंने प्रत्यक्ष कर नीति के जिस दस्तावेज को लाने की बात कही थी वह अब सार्वजनिक हो चुका है। 254 पेज के इस दस्तावेज में निजी करदाताओं से लेकर कंपनी क्षेत्र तक के लिए कई तरह की राहत के संकेत हैं। कर रचना को आसान बनाने जैसी बातें भी हैं और कर चोरी के रास्तों को बंद करने की कोशिश भी। इसके पीछे की मूल सोच यही है कि करों का दायरा बढ़ाया जाए, उसकी छतरी के नीचे ज्यादा से ज्यादा लोगों को लाया जाए, उसके बाद दरों को नीचे लाया जाए तो कुल जमा कर संग्रह बढ़ेगा ही। पिछला आयकर कानून 1961 में लागू हुआ था, तब से अब तक बहुत कुछ बदल गया है। देश का अर्थतंत्र भी, लोगों की आमदनी भी और करों की सोच भी। दो फीसदी विकास दर वाले युग में हमने जो तंत्र बनाया था, वह चार गुना से भी ज्यादा बढ़ गई विकास दर वाले जमाने में चल भी नहीं सकता। इन नई हकीकतों के हिसाब से तो करों के नियम कायदे और कानून बहुत पहले ही बदल जाने चाहिए थे, लेकिन शायद अभी भी देर नहीं हुई है। इस बीच आबादी के बहुमत ने तो नहीं लेकिन एक बड़े तबके ने समृद्धि के स्वाद को चखना सीख लिया है, और छोटे-मोटे कर सुधारों से सरकारी खजाने में जो बरकत हुई है, उसने हमारी सरकारों को एक नया आत्मविश्वास भी दिया है।

प्रत्यक्ष करों के इस प्रस्तावित कोड में दरअसल सरकार के उसी आत्मविश्वास की ही झलक है। आज ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना और भोजन के अधिकार जसे मामलों में सरकार जो पैसा खर्च कर रही है, वह हो सकता है कि बहुत से लोगों को कम लगे। या हो सकता है कि यह लगे कि हमारी समस्याओं का आकार जितना बड़ा है, उसके सामने धन के ये प्रावधान कुछ भी नहीं हैं। लेकिन यह भी सच है कि आज सरकार जितने बड़े प्रावधान करने की स्थिति में है, दो दशक पहले उनके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। जिन कर सुधारों से हमने राजस्व संग्रह की इस मंजिल को हासिल किया था, उसे आगे बढ़ाने में ही समझदारी है और सरकार यही कर भी रही है। यानी यह मसला सिर्फ कंपनी क्षेत्र और मध्य वर्ग को राहत देने भर का ही नहीं है, वरन निचले तबकों तक और राहत भेजने का भी है। कल्याणकारी योजनाओं के लिए और अधिक धन जुटाने का भी है। हमने अर्थव्यवस्था के जिस मॉडल को पिछले कुछ समय में विकसित किया है, अब उसके विस्तार का समय आ गया है।

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