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कंचनजंगा हिमशिखर

कंचनजंगा हिमशिखर

पर्वतारोहण एक ऐसी गतिविधि है, जिसमें इंसान ऊंचे पर्वतों की चोटियों को छू लेना चाहता है। यह ऊंची चोटियां अंग्रेजी में माउंटेन पीक कहलाती हैं। जानते हो, संसार की विभिन्न पर्वत श्रेणियों में हजारों फुट ऊंची बहुत सी पीक्स हैं। बर्फ से ढकी ये चोटियां पर्वतारोहण के शौकीन लोगों को निरंतर आकर्षित करती हैं। तुम्हें अगर साहसी खेलों का शौक है तो बड़े होकर तुम भी माउंटेनियर यानी पर्वतारोही बन सकते हो। इसलिए हम अभी से तुम्हें अपने देश और अन्य देशों के महत्त्वपूर्ण पर्वत शिखरों के विषय में बता रहे हैं, ताकि तुम बड़े होकर इनकी ऊंचाइयों तक पहुंचने का साहस कर सको। आज हम तुम्हें कंचनजंगा पीक के बारे में बताते हैं। पता है यह संसार की तीसरी सबसे ऊंची पर्वत चोटी है, जिसकी ऊंचाई 28169 फुट है। सोचो इतनी ऊंचाई तक बर्फीले दुर्गम रास्तों से चढ़ना कितना कठिन होगा। लेकिन दुनिया में ऐसे साहसी लोग बहुत हैं, जो ऐसे शिखरों पर फतह पा चुके हैं। कंचनजंगा पीक भारत और नेपाल की सीमा पर स्थित है।  इसका एक हिस्सा हमारे देश के सिक्किम राज्य में है तो शेष भाग नेपाल की सीमा में आता है। कंचनजंगा तिब्बती भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है हिम के पांच भंडार। यह नाम इसलिए पड़ा, क्योंकि कंचनजंगा पर्वत पांच शिखरों का समूह है।

तुम्हें एक रोचक बात बतायें, सन 1852 तक कंचनजंगा को ही विश्व की सबसे ऊंची चोटी माना जाता था, लेकिन 1849 में हुए ब्रिटिश सर्वे के बाद ज्ञात हुआ कि एवरेस्ट दुनिया की सर्वोच्च शिखर है। लेकिन कंचनजंगा शिखर पर पहुंचने के रास्ते बहुत दुर्गम हैं, इसलिए वहां तक पहुंचने के प्रयास कम ही हुए हैं। 1855 में पहली बार ब्रिटिश अभियान के जॉय ब्राउन और जॉर्ज बेंड सफलता पूर्वक इस चोटी पर पहुंच थे, जबकि कंचनजंगा पर पहुंचने के लिए 1905 में पहला प्रयास किया गया था। 1929 में एक जर्मन अभियान दल के सदस्य 24280 फुट की ऊंचाई तक पहुंच गये थे। किन्तु उन्हें पांच दिन तक चले एक भयंकर बर्फीले तूफान की वजह से वापस आना पड़ा। इससे तुम समझ सकते हो कि पर्वतारोही कितने साहसी व्यक्ति होते हैं। 1977 में भारतीय सेना के जवानों ने कर्नल नरेन्द्र कुमार के नेतृत्व में पूर्वात्तर के कठिन मार्ग की ओर से इस शिखर को फतह किया था। मार्ग में कई खतरनाक ग्लेशियर और बर्फ की खाइयों को पार करके यह लोग कंचनजंगा की चोटी तक पहुंचे थे। 1983 में पियरे बेगिन ने तो कमाल ही कर दिया। उन्होंने अकेले और बिना ऑक्सीजन के कंचनजंगा के शिखर को स्पर्श किया था। तुम समझ सकते हो ऐसा दुस्साहस करने वाले वह विश्व के पहले व्यक्ति थे। लेकिन वांदा रुत्कीविज नामक पोलैंड के पर्वतारोही इनसे भी ज्यादा दुस्साहसी थे। वह 1992 में शिखर के बेहद करीब थे कि तभी भयंकर तूफान आ गया। उनकी टीम के सदस्य तूफान का अंदेशा देख वापस चलने लगे तो उन्होंने वापस चलने से इंकार कर दिया। किन्तु वह उस तूफान से बच न सके। वैसे ऊंचे शिखरों पर चढ़ते हुए कई बार प्राकृतिक आपदाओं की वजह से कुछ पर्वतारोहियों की मृत्यु हो जाती है। 1998 में जिनेत हेरिसन कंचनजंगा पर पहुंचने वाली पहली महिला बनीं। देख लो,  लड़कियां भी पर्वतारोहण जैसे साहस भरे कारनामे करने में किसी से पीछे नहीं रहतीं। तुम मम्मी-पापा के साथ कभी दार्जिलिंग घूमने जाओ तो वहां से कंचनजंगा हिम शिखर को देख सकते हो। साफ मौसम हो तो वहां तुम्हें कई स्थानों से बेहद सुंदर दृश्य नजर आएंगे। इसके अलावा सिक्किम में भी कई स्थानों से कंचनजंगा पीक नजर आती है। सिक्किम के लोग तो इस शिखर को पवित्र मान कर इसकी पूजा करते हैं। नेपाल के क्षेत्र में वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड द्वारा कंचनजंगा कंजरवेशन प्रोजेक्ट स्थापित किया गया है। भारतीय क्षेत्र में कंचनजंगा का संरक्षित क्षेत्र कंचनजंगा नेशनल पार्क कहलाता है। इस नेशनल पार्क में कई हिम क्षेत्र के वन्य जीवों के साथ लाल पांडा भी पाया जाता है। बर्फ से ढके इस क्षेत्र में सैर-सपाटे के लिए जाने की हिम्मत किसी में नहीं होती। बड़े होकर तुम पर्वतारोहण के प्रशिक्षण के बाद अन्य शिखरों के अलावा कंचनजंगा पर जाने का प्रयास भी करना।       

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