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सांप्रदायिक हिंसा पर निगरानी सूची में भारत

सांप्रदायिक हिंसा पर निगरानी सूची में भारत

अंतरराष्ट्रीय मजहबी स्वतंत्रता के लिए अमेरिकी आयोग (यूएससीआईएफ) ने भारत को मजहबी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त प्रतिक्रिया न जताने के कारण निगरानी सूची में रखा है।

यूएससीआईआरएफ के एक बयान में कहा गया है कि भारत में मजहबी अल्पसंख्यकों, खासकर 2008 में उड़ीसा में इसाईयों तथा 2002 में गुजरात में मुस्लिमों के खिलाफ सांप्रदायिक हिंसा में हुई वृद्धि तथा मजहबी अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए भारत सरकार की अपेक्षित प्रतिक्रिया न मिलने की वजह से उसे निगरानी सूची में रखा गया है।

यूएससीआईआरएफ के अध्यक्ष लिओनार्ड लियो ने बताया यह निराशाजनक बात है कि भारत ने मजहबी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और उन्हें न्याय दिलाने के प्रति उतना काम नहीं किया है, जितना करना चाहिए। भारत में अल्पसंख्यकों की कमी नहीं है।

यूएससीआईआरएफ का भारतीय अध्याय (इंडियन चैप्टर) इस सप्ताह उड़ीसा में इसाईयों के खिलाफ हिंसा शुरू होने की पहली बरसी पर जारी किया गया है। कोई भी देश अगर यूएससीआईआरएफ की निगरानी सूची में रखा जाता है तो उस पर उन कारणों को लेकर खास निगरानी की जाती है, जिसकी वजह से उसे इस सूची में रखा गया है।

यूएससीआईआरएफ की निगरानी सूची में शामिल अन्य देशों में अफगानिस्तान, बेलारूस, क्यूबा, मिस्र, इंडोनेशिया, लाओस, रूसी परिसंघ, सोमालिया, ताजिकिस्तान, तुर्की और वेनेजुएला हैं। यूएससीआईआरएफ की सालाना रिपोर्ट इस साल के शुरू में जारी हुई थी। लेकिन भारत में हो रहे आम चुनावों की वजह से उसने अपने भारतीय अध्याय का प्रकाशन विलंब से किया।

यूएससीआईआरएफ के सदस्य स्थिति का प्राथमिक आकलन करने के लिए भारत आना चाहते थे, लेकिन उन्हें वीजा नहीं मिला। संगठन ने पाया कि पिछले साल उड़ीसा के कंधमाल में माओवादी विद्रोहियों ने स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या की, जिसके बाद इसाईयों के खिलाफ हिंसा शुरू हो गई। न केवल इस समुदाय के लोगों पर हमले किए गए बल्कि गिरजाघरों को भी नुकसान पहुंचाया गया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इन हमलों करीब 40 लोग मारे गए, सैकड़ों घर और दर्जनों गिरजाघरों को नुकसान पहुंचाया गया। हजारों लोग विस्थापित हो गए। इनमें से कई लोग अब तक शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं और डर की वजह से अपने घर नहीं लौट रहे हैं।

रिपोर्ट में गुजरात में 2002 में हुए सांप्रदायिक दंगों का भी जिक्र किया गया है। इसमें कहा गया है कि भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पाया कि सरकार धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमले रोकने में नाकाम रही और राज्य के तथा स्थानीय अधिकारियों ने हिंसा फैलाने में साथ दिया।

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