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आओ चलें ब्रजधाम

आओ चलें ब्रजधाम

आइये बच्चो, सबसे पहले हम चलते हैं भगवान श्रीकृष्ण की जन्म-स्थली मथुरा में। यहां भगवान श्रीकृष्ण के जन्मस्थान पर भव्य मंदिर बना है। यह इतना सुन्दर है, जिसे देख कर आप मंत्रमुग्ध हो जाओगे। यहीं पर है कंस का वो कारागार, जहां श्रीकृष्णजी का जन्म हुआ था। और बच्चो, आपको मालूम ही होगा कि वसुदेवजी घनघोर वर्षा और कड़कती बिजली के बीच यमुना पार कर कृष्ण को गोकुल में नंदबाबा के यहां पहुंचाने गए थे। वापस लौटे तो यशोदा के पास लेटी हुई नवजात कन्या को उठा कर साथ में ले आए थे। जब कंस ने देवकी व वसुदेव से उस कन्या को छीन लिया और वहीं एक शिला पर उसके पैर पकड़ कर पटकने ही वाला था कि वह कन्या उसके हाथ से छूट गयी और आकाशवाणी हुई कि - ‘पापी कंस, जिसे तू मारना चाहता था वह तो पैदा हो गया है।’  तो बच्चो यह शिला यहां अब भी मौजूद है, आप देख सकते हो। आपको बता दें कि जन्माष्टमी पर यहां की शोभा अद्भुत होती है। यहां की सजावट देखते ही बनती है। दूर-दूर से यहां लोग कृष्ण जन्म मनाने आते हैं। इस दिन रेडियो और टीवी पर यहां का आंखों देखा हाल सीधा प्रसारित किया जाता है।

गोकुल
बच्चो, अब मथुरा के बाद गोकुल की यात्र पर निकलते हैं। यह स्थान मथुरा से लगभग 15 किलोमीटर दूर यमुना किनारे पर स्थित है। यहां कृष्ण ने अपनी खूब मनमोहक व अद्भुत बाललीलाएं कीं। गोपियों के घरों में जा-जाकर चुपके से छींके से मटकी उतार कर उन्होंने खूब माखन खाया और अपने मित्रों को भी खिलाया। और कई बार गोपियों ने उन्हें रंगे हाथों पकड़ा तो मां यशोदा की डांट भी सुननी पड़ी। अक्सर वह अपने मित्रों के साथ माखन खाने के लिए गोपियों का रास्ता रोक लेते थे और जब माखन नहीं मिलता तो पीछे से गोपियों की माखन भरी मटकी को कंकड़ मार कर फोड़ देते थे। लेकिन इस सबके बावजूद गोपियां उनके छुटपन और मनमोहक छवि को देख कर उनसे शरारत ही करती थीं। अब बात करते हैं यहां के मंदिरों के बारे में। वैसे यहां कई मंदिर हैं, लेकिन तीन प्राचीन मंदिर हैं- गोकुलनाथ मंदिर, मदनमोहन मंदिर और विट्ठलनाथ मंदिर। इनके अलावा राजा ठाकुर मंदिर, गोपाल लालजी व मोरवाला मंदिर प्रसिद्ध हैं। आपको बता दें जिस दिन कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है, उसके दूसरे दिन यहां प्रात: उनके जन्म के सिलसिले में नंद महोत्सव होता है।

वृन्दावन
गोकुल की यात्रा के बाद वृन्दावन चलते हैं। यह पवित्र धाम यमुना नदी के किनारे ही स्थित है, मथुरा से लगभग 15 किलोमीटर दूर। माना जाता है कि यहां पर तुलसी के पेड़ों का भरापूरा जंगल था, इसलिए इस स्थान का नाम वृन्दावन कहलाया।  वैसे संतों की व्याख्या है कि वृन्दा शब्द का अर्थ है भक्त, यानी भक्तों का वन, जहां पर भक्तों का निवास हो, इसलिए इसका नाम वृन्दावन पड़ा। भगवान कृष्ण यहां पर अपने ग्वाल-बाल साथियों के साथ खूब खेला करते थे और गउएं चराया करते थे। यही वह स्थान है, जहां श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ रास रचाया और विभिन्न तरह की अनोखी लीलाएं कीं। अब भी यहां पर उनके द्वारा की गई लीलाओं के स्थलों के अवशेष मौजूद हैं। वैसे वृन्दावन मंदिरों का नगर है। यहां का बांके बिहारी मंदिर तो विश्व प्रसिद्ध मंदिर है, जहां कृष्ण की एक छवि निहारने के लिए लोगों की भीड़ लगी रहती है और जिनके दर्शन कर लोग अपने को धन्य समझते हैं। जन्माष्टमी के दिन यहां बहुत सुन्दर सजावट होती है। तो प्यारे दोस्तो आप भी यहां पर दर्शन करिए और अपने को धन्य समङिाए। इसके बाद यहां रंगनाथ मंदिर है। दक्षिण भारतीय स्थापत्य शैली का यह वैभवशाली मंदिर बहुत बड़े भूभाग में बना है। इनके अलावा यहां बहुत सारे भगवान की लीलाओं से जुड़े स्थल और प्रसिद्ध अनेक मंदिर हैं - इस्कॉन मंदिर, राधामदन मोहन मंदिर, द्वादशादित्य टीला, श्री राधावल्लभ मंदिर, राधारमण मंदिर, वंशीवट, गोपेश्वर महादेव मंदिर, सुदामा कुटीर, प्राचीन श्री गोविंद मंदिर, गोदाविहार मंदिर, रमणरेती आदि। और मथुरा-वृन्दावन मार्ग के बीच बिरला मंदिर, गायत्री तपोभूमि, पागल बाबा मंदिर पड़ते हैं, जो बहुत बड़े और भव्य मंदिर हैं।

गोवर्धन 
तो प्रिय बालवृंदो, अब थोड़ा गोवर्धन की भी परिक्रमा लगा ली जाए। आपने गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा के बारे में तो खूब सुना ही होगा। और आपके आसपास से भी लोग गोवर्धन की परिक्रमा लगाने के लिए जाते ही होंगे। यह स्थल मथुरा से करीब 21 किलोमीटर दूर है। यहां पर गिरिराज गोवर्धन पर्वत विराजमान है, जिसकी परिक्रमा करके लोग धन्य होते हैं। यह सम्पूर्ण परिक्रमा 7 कोस यानी 21 किलोमीटर की है। यह वही गोवर्धन पर्वत है, जिसे भगवान कृष्ण ने अपनी उंगली पर उठा कर देवराज इन्द्र के कोप का भाजन बने समस्त ब्रजवासियों की रक्षा की थी और इन्द्र के घमंड को तोड़ा। तभी से यहां गोवर्धन पर्वत की पूजा व परिक्रमा की शुरुआत मानी जाती है। बाद में इन्द्र ने भगवान कृष्ण से क्षमा याचना कर अपनी गलती स्वीकार की थी।

बरसाना 
अब बच्चो, थोड़ा बरसाना भी घूम लें। यहां की लट्ठमार होली तो विश्व में प्रसिद्ध है। यहां की इस होली को देखने के लिए तो विश्वभर से लोग आते हैं। वैसे आपको मालूम ही होगा बरसाना राधा जी का गांव है। यहां पर श्रीजी यानी श्री राधारानी जी का बहुत ही सुन्दर मंदिर है। इस मंदिर में श्रीराधाकृष्णजी का युगल विग्रह है, जिसकी यहां नित्य पूजा-सेवा की जाती है। श्रीजी मंदिर के सामने ही एक बहुत बड़ा जगमोहन है। यहीं पर ही हर साल होली का आयोजन व होली खेलने के रसिया, झूलन कीर्तन आदि कार्यक्रम होते हैं।

द्वारका
तो दोस्तो, अब हमारी ब्रजधाम के मुख्य-मुख्य दर्शनीय स्थलों की यात्र तो सम्पन्न हुई और अब द्वारका का जिक्र कर लिया जाए। यह तीर्थस्थल गुजरात राज्य के पश्चिम क्षेत्र में स्थित है। भगवान कृष्ण ने मथुरा छोड़ने के बाद इस नगरी का निर्माण विश्वकर्मा द्वारा करवाया था और इसे अपनी राजधानी बनाया। वैसे यह नगरी आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार धामों में से एक है। यहां पर श्रीकृष्णजी को समर्पित भव्य मंदिर है द्वारकाधीश जी का, जिसके दर्शन करने विश्वभर से लोग आते हैं। जन्माष्टमी के दिन इस भव्य मंदिर की रौनक देखने लायक होती है। जन्माष्टमी के दिन यहां के कार्यक्रम का रेडियो और टीवी पर सीधा प्रसारण किया जाता है। तो प्रिय बच्चो कैसी रही जन्माष्टमी की सैर!

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