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जरूरी है बच्चों और नौजवानों की दिमागी सेहत की निगरानी

पिछले कुछ साल में भारत के प्राइवेट स्कूलों में ऐसे बच्चों की अजिर्यां बड़ी तादाद में आई हैं, जिनमें एडीएचडी (अटेंशन डेफिसिट हाइपर-एक्टिव डिसॉर्डर), ऑटिज्म और पव्रेजिव डेवलपमेंट डिसॉर्डर के लक्षण पाए गए हैं। ऐसे बच्चों की बढ़ती संख्या को देखते हुए कई प्रगतिशील स्कूलों ने अब स्पेशल एजुकेशन डिपार्टमेंट भी शुरू कर दिए हैं।

दरअसल, पूरी दुनिया में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है, जिन्हें मानसिक स्वास्थ्य संबंधी डिसॉर्डर (गड़बड़ियों) से जूझना पड़ रहा है। मिसाल के तौर पर अमेरिका को ही देखें, वहां की करीब आधी आबादी को जीवन के किसी न किसी पड़ाव पर मानसिक बीमारी से रूबरू होना पड़ता है और ज्यादातर मामलों में इसकी शुरुआत बचपन या किशोर उम्र से ही हो जाती है।

क्यों बढ़ रहे हैं बाल मनोरोग
स्कूलों में शिक्षक कुछ स्पेशल एजुकेशन संबंधी जरूरतों के बारे में चर्चा करते हैं, लेकिन इससे स्पष्ट नहीं होता कि मानसिक बीमारियों का ये फैलाव असली है या केवल इनके प्रति लोगों में आई जागरूकता और बेहतर डायग्नोसिस का नतीजा? कुछ अन्य लोगों की राय में तेजी से बढ़ती मानसिक बीमारियों के लिए कई फैक्टर एक साथ जिम्मेदार हैं जैसे आनुवंशिकता, जैविक कारण, मानसिक आघात और पर्यावरण संबंधी तनाव और दबाव। एक और तबका उन लोगों का है, जो सामाजिक बिखराव और नष्ट होते जा रहे परिवारों को मानसिक बीमारियों में इजाफे के लिए सबसे बड़ी वजह मानते हैं।

मानसिक बीमारियों का हमला सबसे ज्यादा बचपन या किशोरावस्था में होता है। आमतौर पर एंग्जायटी और इम्पल्स कंट्रोल डिसॉर्डर के सबसे ज्यादा मरीजों को ग्यारह साल की उम्र से ये परेशानियां पैदा होती हैं। एक ताजा अध्ययन में पता चला है कि मानसिक रोगियों में से आधे लोगों को चौदह साल की उम्र से, और तीन-चौथाई लोगों को करीब चौबीस साल की उम्र से मानसिक परेशानियों ने घेरना शुरू कर दिया था।

कब जाएं डॉक्टर के पास
बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर आमतौर पर स्कूलों को जिन मसलों से जूझना पड़ता है, उनमें प्रमुख हैं-एंग्जयटी डिसॉर्डर, ईटिंग डिसॉर्डर (बच्चे खाने-पीने में नखरे करते हैं), पव्रेजिव डेवलपमेंट डिसॉर्डर, विध्वंसक व्यवहारगत डिसॉर्डर, किंडरगार्टन क्लास में ही गुस्सैल होकर शारीरिक प्रतिक्रिया देना (बच्चों में ऐसे लक्षण गंभीर चिंता पैदा करने वाले हैं) और लर्निग और मूड डिसॉर्डर। ऐसे बच्चों की सहायता करने के मकसद से आजकल ज्यादा से ज्यादा स्कूलों में मनोविज्ञानियों और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की नियुक्तियां की जा रही हैं।

अब एक और सवाल खड़ा होता है। कैसे पता चले कि बच्चे को प्रोफेशनल मेंटल ट्रीटमेंट की जरूरत है? अगर बच्चे की स्कूल परफॉर्मेस एकदम से खराब होने लगे, काफी मेहनत के बावजूद पूअर ग्रेड मिलने लगे, वह लगातार चिंतित और परेशान रहने लगा हो, स्कूल जने और बच्चों के साथ खेलने में आनाकानी करने लगे, एकदम से हाइपर-एक्टिव हो गया हो, रात को अक्सर घबराकर उठ बैठता हो, किसी की बात न सुने और झल्लाने लगे, बात-बात पर मुंह फुलाने लगे या दुखी-उदास और चिड़चिड़ा हो गया हो, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।

मगर बच्चे को मेंटल एक्सपर्ट के पास ले जाने से पहले एक बात ध्यान रखें। ऊपर बताए गए लक्षण मामूली तौर पर हों, तो यह कोई असामान्यता नहीं है, और ऐसे बच्चे को डॉक्टर के पास ले जने की कोई जरूरत नहीं है। बढ़ती उम्र के बच्चों में ऐसे कुछ-कुछ लक्षण होते ही हैं। लेकिन जब ऐसा व्यवहार आदत बनने लगे, लंबे अरसे तक कायम रहे, उसकी उम्र के लिहाज से मेल न खाए और उसके और परिवार के लिए मुसीबत बनने लगे, तो वह पक्के तौर पर मानसिक असामान्यता कही जाएगी।

टीवी और बच्चे
टीवी देखने से बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। अब तक हुए कई अध्ययनों में ऐसा निष्कर्ष सामने आया है। कई भारतीय बच्चों की तरह, एक औसत अमेरिकी बच्चा प्राइमरी स्कूल पूरा करते-करते टीवी पर आठ हजार मर्डर देख चुका होता है। अठारह का होते-होते अमूमन एक बच्चा टीवी पर करीब चालीस हजार कत्ल समेत हिंसा की दो लाख हरकतें देख लेता है।

अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन के मुताबिक कुल 3000 अध्ययनों में से 2888 में सामने आया है कि टीवी की हिंसा असल जिंदगी पर असर डालती है। दुनिया भर में होने वाली स्टडीज में सामने आया है कि टीवी से निराशा बढ़ती है। यह भी सच है कि कई बच्चों के लिए टीवी के विज्ञापन ईटिंग डिसॉर्डर, आत्मविश्वास में कमजोरी और अवसाद पैदा करते हैं। इसी वजह से एक्सपर्ट बच्चों के लिए टीवी देखने का अधिकतम समय प्रतिदिन एक घंटा तय करने की वकालत करते हैं। यही नहीं, वे अबोध बच्चों को तो टीवी कतई न दिखाने की बात करते हैं।

अगर आप वाकई अपने बच्चे की मानसिक सेहत के प्रति चिंतित हैं, तो पहले अपने फेमिली डॉक्टर या स्कूल से संपर्क करें। कई स्कूलों में अपने एक्सपर्ट होते हैं, जो आपको सही प्रोफेशनल के पास रेफर कर सकते हैं। आखिर कौन नहीं चाहता कि उसका बच्चा खुशमिजाज और मानसिक व शारीरिक, हर तरह से संतुलित हो? और ऐसा नहीं है कि उसे ऐसा बनाना आपके वश में नहीं है। जरूरत है, तो बस बच्चे की ओर थोड़ा ध्यान   देने की।                                           

(मिंट से)

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